तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (TNAU) ने ICAR-जबलपुर के सहयोग से पार्थेनियम जैसे आक्रामक खरपतवार के प्रबंधन पर एक व्यापक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया है। इस अभियान का उद्देश्य किसानों और छात्रों को इस हानिकारक पौधे के दुष्प्रभावों और इसके नियंत्रण के आधुनिक तरीकों से अवगत कराना है।

  • TNAU और ICAR-जबलपुर ने मिलकर पार्थेनियम प्रबंधन पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया।
  • अभियान के तहत सांस्कृतिक, रासायनिक और जैविक नियंत्रण विधियों पर जोर दिया गया।
  • स्कूल, कॉलेज के छात्रों और खेत मजदूरों को लक्षित कर व्यापक प्रसार योजना बनाई गई है।

तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय (TNAU), कोयंबटूर ने सोमवार को अपने परिसर में खेत मजदूरों के लिए एक विशेष जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया। इस कार्यक्रम को ICAR-जबलपुर के खरपतवार अनुसंधान निदेशालय द्वारा प्रायोजित किया गया था। यह पहल 'पार्थेनियम जागरूकता सप्ताह' का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत रविवार को 'अखिल भारतीय समन्वित खरपतवार प्रबंधन अनुसंधान कार्यक्रम' के तत्वावधान में की गई थी।

TNAU के कृषि विज्ञान विभाग (Department of Agronomy) ने इस अभियान के माध्यम से न केवल कृषि श्रमिकों, बल्कि स्कूली छात्रों, कॉलेज के युवाओं और स्वच्छता कर्मियों तक पहुंचने की योजना बनाई है। इसका मुख्य उद्देश्य पार्थेनियम के हानिकारक प्रभावों और इसके प्रभावी प्रबंधन के बारे में जन-जागरूकता पैदा करना है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि पार्थेनियम जैसे आक्रामक खरपतवार न केवल फसलों की पैदावार को कम करते हैं, बल्कि मानव स्वास्थ्य और पशुधन के लिए भी गंभीर खतरा पैदा करते हैं। यदि इसे समय रहते नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह स्थानीय जैव विविधता को नष्ट कर सकता है और कृषि अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

पार्थेनियम का एकीकृत प्रबंधन ही एकमात्र रास्ता है जिससे हम अपनी मिट्टी की उर्वरता और सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं।

कार्यक्रम का उद्घाटन फसल प्रबंधन प्रभारी पी. राजकुमार द्वारा किया गया, जबकि कृषि विज्ञान विभाग के संकाय सदस्य आर. कृष्णन ने हितधारकों को पार्थेनियम प्रबंधन के विभिन्न तरीकों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने सांस्कृतिक, रासायनिक और जैविक नियंत्रण विधियों के बीच के अंतर और उनके सही उपयोग को समझाया।

इस अवसर पर एक विस्तृत प्रदर्शनी भी लगाई गई, जिसमें पार्थेनियम की आक्रामक प्रकृति, मनुष्यों और पशुओं पर इसके दुष्प्रभावों, फसल की पैदावार में होने वाली कमी और एकीकृत खरपतवार प्रबंधन (Integrated Weed Management) की तकनीकों को प्रदर्शित किया गया। साथ ही, पार्थेनियम से खाद बनाने की आधुनिक तकनीक पर भी प्रकाश डाला गया।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस, जिसे आमतौर पर 'गाजर घास' के नाम से जाना जाता है, एक विदेशी आक्रामक प्रजाति है जिसने भारत के कई हिस्सों में कहर मचाया है। यह पौधा अपनी तीव्र वृद्धि और अन्य पौधों को दबाने की क्षमता के कारण तेजी से फैलता है। पिछले कुछ दशकों में, कृषि विश्वविद्यालयों ने इसके जैविक नियंत्रण के लिए विशिष्ट कीटों और रसायनों के उपयोग पर शोध किया है।

नियंत्रण विधिविवरणप्रभावशीलता
सांस्कृतिकहाथ से उखाड़ना और फसल चक्रमध्यम
रासायनिकचयनात्मक शाकनाशी का उपयोगत्वरित लेकिन जोखिम भरा
जैविकप्राकृतिक शत्रुओं का उपयोगदीर्घकालिक और सुरक्षित
क्या आप जानते हैं?: पार्थेनियम के संपर्क में आने से मनुष्यों में त्वचा की एलर्जी (Dermatitis) और अस्थमा जैसी श्वसन समस्याएं हो सकती हैं।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: पार्थेनियम खरपतवार क्यों खतरनाक है?
उत्तर: यह फसलों की पोषक तत्वों की उपलब्धता को कम करता है और मनुष्यों व पशुओं में एलर्जी पैदा करता है।

प्रश्न 2: इसे नियंत्रित करने का सबसे सुरक्षित तरीका क्या है?
उत्तर: एकीकृत खरपतवार प्रबंधन (IWM), जिसमें जैविक और सांस्कृतिक विधियों का मेल होता है, सबसे सुरक्षित माना जाता है।