मध्य प्रदेश और राजस्थान के किसान, जो भारत के 80% अफीम उत्पादन में योगदान देते हैं, स्थिर खरीद दरों और निजी कंपनियों के प्रवेश के खिलाफ विरोध कर रहे हैं। CPS पद्धति की ओर बदलाव पारंपरिक आजीविका के लिए खतरा बन गया है।
- मध्य प्रदेश और राजस्थान के तीन जिले भारत के कुल अफीम उत्पादन का 80% हिस्सा पैदा करते हैं।
- किसान स्थिर खरीद दरों (₹1,200-2,000/किग्रा) और बढ़ती लागत से जूझ रहे हैं।
- केंद्र सरकार द्वारा 2021 में निजी कंपनियों को CPS उत्पादन की अनुमति देने से किसानों में भारी आक्रोश है।
- मेवाड़ क्षेत्र में अफीम की खेती को 'स्वाभिमान की खेती' माना जाता है, जो पारिवारिक विरासत से जुड़ी है।
मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर स्थित मेवाड़ क्षेत्र में अफीम की खेती केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि एक विरासत है। नीमच जिले के सुंदर बाई जैसे परिवारों के लिए, यह फसल 'स्वाभिमान की खेती' है। यह सदियों पुराना व्यापार है, जिसे कुछ परिवार 200 वर्षों से अधिक समय से कर रहे हैं। यहाँ एक कहावत प्रसिद्ध है, "अफीम और औलाद बराबर", जो इस फसल के प्रति गहरे लगाव को दर्शाती है।
हालांकि, यह स्वाभिमान अब खतरे में है। लाइसेंस होने के बावजूद, आर्थिक स्थिति चिंताजनक है। किसानों का कहना है कि कई वर्षों से खरीद दरें स्थिर हैं, जो मॉर्फिन की सांद्रता के आधार पर ₹1,200 से ₹2,000 प्रति किलोग्राम के बीच रहती हैं। दूसरी ओर, उर्वरकों, श्रम और कीटनाशकों की कीमतों में भारी वृद्धि हुई है, जिससे किसानों का मुनाफा घट गया है।
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह विवाद पारंपरिक कृषि आजीविका और सरकार के औद्योगिक आधुनिकीकरण के बीच टकराव का परिणाम है। सरकार कॉन्सेंट्रेट ऑफ पॉपी स्ट्रॉ (CPS) पद्धति को अपनाकर भारत को वैश्विक फार्मास्युटिकल मानकों के अनुरूप लाना चाहती है ताकि निर्यात बाजार में फिर से पकड़ बनाई जा सके। लेकिन, निजी कंपनियों के प्रवेश ने छोटे किसानों के मन में डर पैदा कर दिया है कि उनका नियंत्रण खत्म हो जाएगा और कॉर्पोरेट एकाधिकार बढ़ेगा।
CPS की ओर संक्रमण वैश्विक व्यापार के लिए एक रणनीतिक कदम है, लेकिन पारंपरिक किसानों के लिए सुरक्षा जाल के बिना, यह एक गरिमामय विरासत को कॉर्पोरेट एकाधिकार में बदल सकता है।
भारत में अफीम का उत्पादन अत्यंत विनियमित है। वर्तमान में, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के 22 जिलों में लगभग 1 लाख किसानों के पास लाइसेंस है। नारकोटिक्स सेंट्रल ब्यूरो, जो केंद्रीय वित्त मंत्रालय के अधीन है, इसकी खरीद का प्रबंधन करता है। नीमच में स्थित सरकारी अफीम एल्कलॉइड वर्क्स 1935 से इस दिशा में मुख्य केंद्र रहा है।
सरकार का तर्क है कि CPS पद्धति कम श्रम-साध्य है और इससे अफीम के अवैध बाजार में कमी आएगी, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा मजबूत होगी। लेकिन किसान इस बात से असहमत हैं। उन्हें डर है कि निजीकरण से नशीली दवाओं के दुरुपयोग की समस्या बढ़ सकती है और सरकारी नियंत्रण ढीला पड़ सकता है।
| विशेषता | पारंपरिक लैंसिंग (गोंद) | CPS पद्धति (तिनका) |
|---|---|---|
| श्रम की आवश्यकता | बहुत अधिक (मैनुअल) | कम (औद्योगिक प्रसंस्करण) |
| मुख्य उत्पाद | अफीम लेटेक्स/गोंद | कॉन्सेंट्रेट ऑफ पॉपी स्ट्रॉ |
| बाजार फोकस | घरेलू/पारंपरिक | वैश्विक फार्मा निर्यात |
| नियंत्रण | सरकारी एकाधिकार | मिश्रित (सरकार + निजी) |
प्रश्न 1: सरकार CPS पद्धति की ओर क्यों बढ़ रही है?
सरकार का मानना है कि CPS पद्धति अधिक कुशल है, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है और इससे भारत को वैश्विक फार्मा बाजार में फिर से जगह मिलेगी।
प्रश्न 2: भारत में अफीम के सबसे बड़े उत्पादक जिले कौन से हैं?
मंदसौर, नीमच और चित्तौड़गढ़ मिलकर भारत के कुल अफीम उत्पादन का लगभग 80% हिस्सा पैदा करते हैं।