भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने मेडिकल डिवाइस नियमों में बदलाव प्रस्तावित किए हैं, जिससे आउटसोर्स्ड स्टेरिलाइजेशन पर अलग लाइसेंस की जरूरत खत्म होगी और यूरोपीय संघ को सख्त नियामक क्षेत्रों की सूची में जोड़ा गया है। इन कदमों से परीक्षण शुल्क मानकीकृत होंगे और पात्र उपकरणों के बाजार प्रवेश में तेजी आएगी।
- आउटसोर्स्ड स्टेरिलाइजेशन पर अलग लाइसेंस की जरूरत समाप्त
- EU को सख्त नियामक सूची में जोड़ा गया
- परीक्षण शुल्क मानकीकरण और बाजार प्रवेश तेज
भारत सरकार ने मेडिकल डिवाइस नियम, 2017 में संशोधन प्रस्तावित किए हैं, जिसका उद्देश्य नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाना, परीक्षण शुल्क को मानकीकृत करना और पात्र उपकरणों के तेज बाजार प्रवेश को सुविधाजनक बनाना है। यह पहल उद्योग के लिये व्यापार करने की लागत को घटाने और नियामक पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
नियम 44 में प्रस्तावित परिवर्तन के तहत, यदि कोई निर्माता अपने उपकरणों की स्टेरिलाइजेशन किसी ऐसी सुविधा को आउटसोर्स करता है जो पहले से ही मेडिकल डिवाइस नियम, 2017 के तहत वैध लाइसेंस रखती है, तो उसे अतिरिक्त लोन लाइसेंस प्राप्त करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। पहले यह दोहराव वाली प्रक्रिया थी, जिससे कागजी कार्य और प्रशासनिक बोझ बढ़ता था।
हालाँकि, ट्रैसेबिलिटी की शर्त बरकरार रखी गई है। निर्माताओं को अब अपने उपकरण के लेबल पर स्टेरिलाइजेशन सुविधा का लाइसेंस नंबर उल्लेख करना अनिवार्य है। इस बदलाव को लागू करने के लिये छह महीने का संक्रमणकाल दिया गया है, ताकि कंपनियों को लेबल, पैकेजिंग और संबंधित प्रक्रियाओं में संशोधन करने का समय मिल सके।
नियम 63 में किया गया एक और प्रमुख परिवर्तन यह है कि यूरोपीय संघ (EU) को उन सख्त नियामक क्षेत्रों में शामिल किया गया है, जिनकी स्वीकृति के आधार पर भारत में क्लिनिकल इवेस्टिगेशन की आवश्यकता में छूट मिल सकती है। पहले इस सूची में संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान शामिल थे। अब EU के मान्य उपकरण भी पात्रता शर्तों को पूरा करने पर छूट का लाभ उठा सकते हैं।
इस कदम से आयातकों और निर्माताओं के लिये नियामक समयसीमा घटेगी, जिससे नवीनतम मेडिकल तकनीकें भारतीय रोगियों तक तेजी से पहुँच सकेंगी। साथ ही यह अंतरराष्ट्रीय नियामक संगतता को बढ़ावा देगा और भारत के मेडिकल डिवाइस उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता को सुदृढ़ करेगा।
सरकार ने इन संशोधनों को तैयार करने में विभिन्न हितधारकों से परामर्श किया है और इसे व्यापक नियामक सुधार कार्यक्रम का हिस्सा बताया है, जिसका लक्ष्य गुणवत्ता, सुरक्षा और प्रदर्शन मानकों को बनाए रखते हुए उद्योग को प्रोत्साहित करना है।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that simplifying licensing for outsourced sterilisation removes a major bottleneck for small and medium‑sized manufacturers, while EU inclusion aligns India with global best‑practice regulatory frameworks, potentially attracting higher‑value foreign investments.
"इन बदलावों से भारत में मेडिकल डिवाइस उद्योग की दक्षता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी," कहा एक उद्योग विशेषज्ञ ने।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या मौजूदा स्टेरिलाइजेशन लाइसेंस वाले विदेशी सुविधाओं को अभी भी लेबल में लाइसेंस नंबर दिखाना होगा?
उत्तर: हाँ, ट्रैसेबिलिटी सुनिश्चित करने के लिये लाइसेंस नंबर का उल्लेख अनिवार्य रहेगा।
प्रश्न 2: EU‑स्वीकृत उपकरणों को क्लिनिकल इवेस्टिगेशन छूट मिलने में किन शर्तों को पूरा करना होगा?
उत्तर: उपकरण को EU के मानक नियमों के अनुसार अनुमोदित होना चाहिए और भारत में निर्धारित पात्रता मानकों को पूरा करना आवश्यक है।