भारत ने यूके को $140 मिलियन मूल्य के माल को शून्य आयात शुल्क पर निर्यात किया, जो भारत‑यूके व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते (CETA) की पहली कार्यवाही का प्रतीक है। 50 से अधिक निर्यात बर्तनों ने 20 से अधिक बंदरगाह, हवाई अड्डे और विशेष आर्थिक क्षेत्रों से प्रस्थान किया।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- पहले दिन $140 मिलियन निर्यात, शून्य शुल्क
- इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, वस्त्र आदि प्रमुख क्षेत्रों में वृद्धि
- CETA के तहत 99% भारतीय निर्यात को टैरिफ़ मुक्त पहुंच
नई दिल्ली— भारत‑यूके व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौता (CETA) के लागू होते ही भारत ने यूके को $140 मिलियन मूल्य के माल का निरंकुश निर्यात किया, जैसा कि वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने बताया। 50 से अधिक निर्यात बर्तनों को देश के विभिन्न बंदरगाह, हवाई अड्डे और विशेष आर्थिक क्षेत्रों से प्रस्थान किया गया।
पृष्ठभूमि और वार्ता प्रक्रिया
यह समझौता 14 वार्ता दौर और 800 से अधिक तकनीकी सत्रों के बाद तैयार हुआ, जिसे भारत के इतिहास में सबसे महत्वाकांक्षी व्यापार समझौतों में गिना जाता है। CETA ने भारतीय निर्यातकों को लगभग 99% वस्तुओं पर यूके में शून्य आयात शुल्क की गारंटी दी, जिससे पहले 2% से 16% तक विभिन्न टैरिफ़ लागू होते थे।
मुख्य निर्यात क्षेत्रों का विवरण
निर्यात बर्तनों में इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, रत्न‑आभूषण, वस्त्र और अन्य उत्पाद शामिल थे। इन माल को मुंद्रा, नहावा शिवा और चेन्नई बंदरगाहों तथा मुंबई, कोलकाता और हैदराबाद के हवाई कार्गो हब से भेजा गया। इस कदम से लेदर, फुटवियर, यांत्रिक एवं विद्युत मशीनरी, प्लास्टिक, बेस मेटल्स और समुद्री उत्पादों को भी लाभ मिलेगा।
आर्थिक प्रभाव और भविष्य की संभावनाएं
ब्रिटिश हाई कमिश्नर लिंडी कैमरों ने कहा कि दीर्घकालिक रूप से यह समझौता द्विपक्षीय व्यापार को वार्षिक £25 बिलियन से अधिक बढ़ा सकता है और दोनों देशों के जीडीपी में लगभग £5 बिलियन का योगदान देगा। वाणिज्य विभाग निर्यात प्रोमोशन काउंसिलों के साथ मिलकर निर्माताओं और औद्योगिक क्लस्टरों को समझौते के लाभ उठाने में मदद करेगा।
विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता न केवल वस्तु स्तर पर बल्कि सेवाओं और निवेश के क्षेत्रों में भी नई संभावनाएं खोलता है। भारत‑यूके व्यापारिक संबंधों में इस तरह की टैरिफ़‑मुक्त पहुंच दोनों देशों के निर्यातकों को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाती है, जिससे दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता को बल मिलेगा।