सरकार की नीतियों और बड़े पैमाने पर जौ व गन्ने के उपयोग से भारत ने 700 करोड़ लीटर अतिरिक्त इथेनॉल क्षमता हासिल की है। इस अधिशेष को कैसे उपयोग में लाया जाए, यह सवाल अब नीति निर्माताओं के समक्ष है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- भारत ने 700 करोड़ लीटर अतिरिक्त इथेनॉल क्षमता हासिल की।
- अतिरिक्त क्षमता का उपयोग नीतियों, बाजार और पर्यावरणीय लाभों पर निर्भर करेगा।
- सरकार को नई ब्लेंडिंग मानक, निर्यात प्रोत्साहन और बायो‑इंधन इकोसिस्टम को सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
भारत ने हाल ही में 700 करोड़ लीटर अतिरिक्त इथेनॉल उत्पादन क्षमता हासिल कर ली है, जो राष्ट्रीय बायो‑इंधन योजना के तहत स्थापित लक्ष्य से अधिक है। यह उपलब्धि मुख्यतः जौ‑गन्ने के विस्तार, नई मिलों की स्थापना और तकनीकी उन्नति के कारण संभव हुई। परंतु, इस अधिशेष को प्रभावी रूप से उपयोग करने के लिए स्पष्ट रणनीति की कमी अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है।
पृष्ठभूमि और नीति ढांचा
भारत की इथेनॉल नीति 2018 में शुरू हुई, जिसका प्रमुख लक्ष्य ईंधन मिश्रण (E10) को बढ़ाना और आयातित पेट्रोल पर निर्भरता घटाना था। सरकार ने 2022 तक 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग लक्ष्य निर्धारित किया, जिससे जौ‑गन्ने की मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इस प्रक्रिया में कई नई मिलें स्थापित हुईं, जिससे राष्ट्रीय उत्पादन क्षमता में 700 करोड़ लीटर की अतिरिक्त क्षमता जुड़ी।
वर्तमान स्थिति और चुनौतियाँ
अतिरिक्त क्षमता के बावजूद, इथेनॉल की घरेलू मांग अभी भी लक्ष्य से कम है। मुख्य कारणों में सीमित वितरण नेटवर्क, इंजन तकनीकी अनुकूलन की कमी और कीमत‑प्रतिस्पर्धा शामिल हैं। साथ ही, साखर उद्योग को भी इस अधिशेष से लाभ उठाने के लिए नई रणनीतियों की आवश्यकता है, क्योंकि गन्ने की उपज का बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में जाता है।
संभावित रणनीतियां
1. **ब्लेंडिंग मानक को बढ़ाना** – 10% के बजाय 15% या 20% तक इथेनॉल मिश्रण को अनिवार्य बनाना, जिससे मांग में स्थायी बढ़ोतरी होगी।
2. **निर्यात प्रोत्साहन** – दक्षिण‑पूर्व एशिया और अफ्रीका के देशों को इथेनॉल निर्यात के लिए विशेष टैक्स रिहाई और लॉजिस्टिक सहायता प्रदान करना।
3. **बायो‑इंधन इकोसिस्टम** – गन्ने की बायो‑मास, जैविक कच्चा माल और बायोडीज़ल को एकीकृत करने वाली औद्योगिक क्लस्टर बनाना, जिससे उत्पादन लागत घटेगी।
भविष्य की संभावनाएं
यदि सरकार इन रणनीतियों को समय पर लागू करती है, तो 700 करोड़ लीटर अतिरिक्त क्षमता न केवल ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करेगी, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, जलवायु लक्ष्य और विदेशी मुद्रा बचत में भी योगदान देगी। हालांकि, नीति में निरंतरता, निवेशकों का विश्वास और तकनीकी अनुकूलन ही इस योजना की सफलता के प्रमुख कारक रहेंगे।