लेखक आर.एस. शर्मा का तर्क है कि UPI को मुफ्त रखना चाहिए और इसके संचालन का खर्च मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) के बजाय मुद्रा प्रबंधन से होने वाली सरकारी बचत से वहन किया जाना चाहिए।
- UPI वर्तमान में भारत के डिजिटल भुगतान का 85% हिस्सा संभाल रहा है।
- MDR लागू करने से छोटे व्यापारियों और गरीब उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ेगा।
- UPI से होने वाली बचत, जैसे नोट छापने का कम खर्च, सिस्टम को चलाने के लिए इस्तेमाल होनी चाहिए।
भारत ने एक ऐसा चमत्कार कर दिखाया है जो दुनिया के किसी अन्य देश के लिए संभव नहीं रहा—रियल-टाइम डिजिटल भुगतान को मुफ्त, तत्काल और सार्वभौमिक बनाना। इसने करोड़ों लोगों को औपचारिक अर्थव्यवस्था से जोड़ा है। हालांकि, हाल ही में संसद द्वारा पारित 'टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026' ने सरकार को भविष्य में UPI पर शुल्क लगाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है, जो डिजिटल क्रांति के लिए एक गंभीर चुनौती बन सकता है।
डिजिटल अर्थव्यवस्था का आधार: UPI
वर्ष 2025-26 में, UPI ने 24,000 करोड़ से अधिक लेनदेन किए, जिनकी कुल राशि लगभग 314 लाख करोड़ रुपये थी। यह भारत के डिजिटल रिटेल भुगतान का लगभग 85 प्रतिशत है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इनमें से 86 प्रतिशत मर्चेंट भुगतान 500 रुपये से कम के हैं। यह प्रणाली सब्जी विक्रेताओं, ऑटो चालकों और किराना दुकानदारों की जीवन रेखा बन चुकी है। ऐसे में, यदि इस पर कोई शुल्क लगाया जाता है, तो यह केवल व्यापार पर कर नहीं होगा, बल्कि देश के सबसे गरीब वर्ग के छोटे लेनदेन पर एक सीधा बोझ होगा।
MDR क्यों एक गलत उपकरण है?
मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) कार्ड-आधारित भुगतान की विरासत है, जहाँ भौतिक कार्ड, टर्मिनल और क्रेडिट जोखिम के कारण शुल्क लिया जाता है। लेकिन UPI में इनमें से कुछ भी नहीं है। यहाँ न तो कोई कार्ड है, न ही कोई महंगा टर्मिनल, और न ही क्रेडिट जोखिम। BozokMedia analysis shows कि UPI एक ओपन प्रोटोकॉल है जो बैंकों को एक साझा भाषा प्रदान करता है, जिससे लेनदेन की लागत न्यूनतम हो जाती है।
UPI को शुल्क मुक्त रखना ही भारत को वास्तव में कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाने का एकमात्र रास्ता है।
बचत से वित्तपोषण का मॉडल
जब हम डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देते हैं, तो राज्य और बैंकों को भारी बचत होती है। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) हर साल नोट छापने पर लगभग 5,000-6,400 करोड़ रुपये खर्च करता है। इसके अलावा, नकद प्रबंधन, भंडारण और परिवहन की लागत भी बहुत अधिक है। UPI के माध्यम से, नकद की आवश्यकता कम हो जाती है, जिससे सरकार को बड़ी बचत होती है।
लेखक का सुझाव है कि सरकार को MDR के माध्यम से व्यापारियों से पैसा वसूलने के बजाय, मुद्रा प्रबंधन से होने वाली इस बचत का एक हिस्सा उन संस्थानों (जैसे NPCI और बैंक) को वापस देना चाहिए जो इस बुनियादी ढांचे को चलाते हैं। यह एक सब्सिडी नहीं, बल्कि प्रदान की गई सेवा के लिए पारदर्शी भुगतान होना चाहिए।
निष्कर्ष: डिजिटल परिवर्तन को खतरा
भारत एक अत्यधिक मूल्य-संवेदनशील (price-sensitive) बाजार है। यदि डिजिटल भुगतान में एक रुपया भी अतिरिक्त लगता है, तो लोग वापस नकद की ओर लौट सकते हैं। 0.3% का मामूली शुल्क भी खुदरा अर्थव्यवस्था से सालाना 27,000 करोड़ रुपये निकाल सकता है। डिजिटल क्रांति को धीमा करने के बजाय, हमें इसे सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
Frequently Asked Questions
1. MDR क्या है और यह UPI को कैसे प्रभावित करेगा?
MDR यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट वह शुल्क है जो व्यापारी भुगतान प्राप्त करने के लिए भुगतान करते हैं। यदि इसे UPI पर लागू किया गया, तो छोटे व्यापारियों के लिए डिजिटल भुगतान महंगा हो जाएगा।
2. क्या सरकार UPI पर शुल्क लगा सकती है?
हाँ, नए संशोधनों के बाद सरकार के पास भविष्य में कुछ विशिष्ट भुगतान मोड पर शुल्क लगाने का अधिकार है, लेकिन वर्तमान में यह मुफ्त है।