मुंबई में आयोजित रीसाइक्लिंग शो में विशेषज्ञों ने बताया कि भारत का रीसाइक्लिंग क्षेत्र अब मात्रा से आगे बढ़कर गुणवत्ता, ट्रैसेबिलिटी और उन्नत तकनीक की ओर बढ़ रहा है। EPR नियमों और खनिजों की बढ़ती मांग ने इस क्षेत्र में बड़े निवेश के द्वार खोल दिए हैं।
- भारत का रीसाइक्लिंग मॉडल अब 'वॉल्यूम' (मात्रा) के बजाय 'क्वालिटी' (गुणवत्ता) और 'ट्रैसेबिलिटी' (पता लगाने की क्षमता) पर केंद्रित होगा।
- EPR (विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व) और महत्वपूर्ण खनिजों की मांग निवेश को गति दे रही है।
- XRF और मशीन विजन जैसी सेंसर-आधारित तकनीकें कचरे से उच्च मूल्य वाले पदार्थ निकालने में क्रांतिकारी साबित होंगी।
मुंबई में आयोजित Plastics Recycling Show India (PRS India) 2026 और Bharat Recycling Show (BRS) 2026 के दौरान उद्योग विशेषज्ञों ने भारत के पुनर्चक्रण (Recycling) पारिस्थितिकी तंत्र में हो रहे बड़े बदलावों पर चर्चा की। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अब एक रैखिक (Linear) कचरा प्रबंधन मॉडल से निकलकर एक उच्च-मूल्य, तकनीक-संचालित सर्कुलर इकोनॉमी (Circular Economy) की ओर बढ़ रहा है।
McKinsey & Company के वरिष्ठ सलाहकार आर.वी. श्रीधर ने इस बात पर जोर दिया कि रीसाइक्लिंग उद्योग का अगला चरण केवल कचरे की मात्रा बढ़ाने के बारे में नहीं है, बल्कि इसकी गुणवत्ता और पारदर्शिता के बारे में है। उन्होंने कहा, "गुणवत्ता यार्ड में खरीदी जाती है, रिफाइनरी में नहीं।" इसका अर्थ है कि यदि शुरुआत में ही कचरे की छंटाई और गुणवत्ता सही नहीं होगी, तो उसे रिफाइन करना आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं होगा।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए माध्यमिक कच्चे माल (Secondary Raw Materials) की मांग बढ़ रही है। जैसे-जैसे सरकार EPR मानदंडों को कड़ा कर रही है, कंपनियों के लिए पुनर्चक्रित सामग्री का उपयोग करना अनिवार्य होता जा रहा है, जिससे एक नया बाजार तैयार हो रहा है।
श्रीधर ने चीन और ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत को भी अनुपयोगी लौह अयस्क से महत्वपूर्ण खनिज जैसे टाइटेनियम और इरिडियम निकालने की तकनीक सीखनी चाहिए। उन्होंने ई-कचरे (e-waste) के प्रबंधन के लिए XRF, LIBS और मशीन विजन जैसे सेंसर-आधारित सॉर्टिंग समाधानों को भविष्य की सबसे बड़ी तकनीकी आवश्यकता बताया।
"भारत का पुनर्चक्रण विकास अब केवल मात्रा से नहीं, बल्कि गुणवत्ता, ट्रैसेबिलिटी और तकनीक से निर्धारित होगा।"
कॉर्पोरेट जगत की दिग्गज कंपनियां भी इस बदलाव का हिस्सा बन रही हैं। Colgate-Palmolive India की शिल्पाश्री मुनिसवाम्मा ने बताया कि उनके भारत में निर्मित 100% टूथपेस्ट ट्यूब अब रिसाइकिल करने योग्य हैं। वहीं, JSW Group के प्रभाधा आचार्या ने बताया कि वे स्टील स्लैग को सीमेंट में बदलकर और उत्सर्जन कम करके स्थिरता की दिशा में काम कर रहे हैं।
ब्यानन नेशन की कियारा आहूजा ने एक महत्वपूर्ण चुनौती की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि भारत में FMCG-ग्रेड के पुनर्चक्रित प्लास्टिक की मांग 20 लाख टन से अधिक है, लेकिन वर्तमान प्रमाणित क्षमता इसकी तुलना में बहुत कम है। इस अंतर को पाटने के लिए विश्वसनीय और प्रमाणित रीसाइक्लिंग बुनियादी ढांचे की तत्काल आवश्यकता है।
Frequently Asked Questions
1. EPR क्या है और यह रीसाइक्लिंग को कैसे प्रभावित करता है?
EPR यानी 'Extended Producer Responsibility' एक नीति है जिसमें उत्पादकों को उनके उत्पादों के जीवनकाल के अंत में उनके निपटान और पुनर्चक्रण की जिम्मेदारी लेनी होती है। यह रीसाइक्लिंग के लिए मांग पैदा करता है।
2. भारत में रीसाइक्लिंग का भविष्य क्या है?
भारत का भविष्य उच्च-तकनीकी सॉर्टिंग, डिजिटल ट्रैसेबिलिटी और सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल पर आधारित है जो कच्चे माल की कमी को दूर करेगा।