मैसूर के नंजराजा बहादुर चौल्ट्री में दो दिवसीय देसी सोपू मेला शुरू हुआ है, जहाँ 200 से अधिक दुर्लभ और पोषण युक्त स्वदेशी सागों को प्रदर्शित किया गया है। यह आयोजन पारंपरिक कृषि ज्ञान को बचाने और लुप्त होती वनस्पतियों के संरक्षण के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है।

  • मैसूर में दो दिवसीय 'देसी सोपू मेला' का आयोजन किया गया।
  • 200 से अधिक दुर्लभ और स्वदेशी सागों की किस्मों का प्रदर्शन।
  • पारंपरिक कृषि ज्ञान और पोषण के महत्व पर जोर।
  • नगाराहोल और कनकपुरा जैसे क्षेत्रों से विशेष सागों की उपलब्धता।

मैसूर के ऐतिहासिक नंजराजा बहादुर चौल्ट्री में दो दिवसीय 'देसी सोपू मेला' का शानदार आगाज़ हुआ है। इस मेले का मुख्य उद्देश्य लुप्त होती स्वदेशी वनस्पतियों और पारंपरिक कृषि ज्ञान को पुनर्जीवित करना है। आयोजन में सहज समृद्ध, कीस्टोन फाउंडेशन, हुलिकाडु फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी और ICAR-JSS कृषि विज्ञान केंद्र ने संयुक्त रूप से भागीदारी की है।

मेले का उद्घाटन करते हुए हावेरी के थिम्मापुर की महिला किसान नीलम्मा केमनावर ने पारंपरिक ज्ञान के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हमारे बुजुर्गों ने हमें खेतों और जलाशयों के पास उगने वाले खाद्य सागों से परिचित कराया था। उन्होंने चेतावनी दी कि शाकनाशियों (herbicides) के बढ़ते उपयोग के कारण यह विविधता तेजी से समाप्त हो रही है।

पारंपरिक ज्ञान का संकट

कीस्टोन फाउंडेशन के वरिष्ठ कार्यक्रम समन्वयक रामचंद्रन जी. ने एक महत्वपूर्ण तथ्य साझा किया। उन्होंने बताया कि दुनिया भर में 3,000 से अधिक पौधों की प्रजातियों का उपयोग भोजन के रूप में किया जाता है, लेकिन आधुनिक मनुष्य केवल 30 प्रजातियों पर ही निर्भर है। शेष 2,970 प्रजातियां मुख्य रूप से स्थानीय और आदिवासी समुदायों द्वारा उपयोग की जाती हैं, जो अब धीरे-धीरे विलुप्त हो रही हैं।

आजकल शाकनाशियों के बढ़ते उपयोग से खाद्य सागों की विविधता समाप्त हो रही है, हमें अपने बच्चों को यह ज्ञान देना होगा।

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह मेला केवल एक प्रदर्शनी नहीं है, बल्कि खाद्य सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण कदम है। विशेष रूप से मैसूर में इस वर्ष 49% वर्षा की कमी देखी गई है, ऐसे में साग उगाना एक बेहतर विकल्प है क्योंकि इन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है और ये मात्र दो महीनों में तैयार हो जाते हैं।

मेले के मुख्य आकर्षण

इस मेले में विभिन्न क्षेत्रों से आए विशेष साग आकर्षण का केंद्र रहे। नगाराहोल क्षेत्र के किसान 'बेराके सोपू' और 'अन्ने सोपू' लेकर आए हैं, जबकि कनकपुरा के जंगलों से 'सीगाए सोपू' प्रदर्शित किया गया है। इसके अलावा, कुडगल से 'किरकासली' और 'गुर्जी' जैसे शुष्क भूमि के साग भी उपलब्ध हैं।

भोजन प्रेमियों के लिए यहाँ पारंपरिक व्यंजनों की एक विस्तृत श्रृंखला उपलब्ध है, जिसमें रागी मुद्दे के साथ बसारू, ज्वार रोटी के साथ किरकासली पल्या और ग्रीन्स चपाती शामिल हैं। मेले में स्वदेशी चावल, बाजरा, दालें और जैविक बीज भी बिक्री के लिए उपलब्ध हैं।

Did You Know?: साग की कई प्रजातियों को 'खरपतवार' माना जाता है, लेकिन वे वास्तव में पोषक तत्वों का खजाना होती हैं।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: देसी सोपू मेला क्यों आयोजित किया जाता है?
उत्तर: इसका उद्देश्य लुप्त हो रहे स्वदेशी सागों के संरक्षण और लोगों को उनके पोषण संबंधी लाभों के बारे में जागरूक करना है।

प्रश्न 2: इस मेले में कौन से विशेष साग उपलब्ध हैं?
उत्तर: मेले में बेराके सोपू, सीगाए सोपू, किरकासली और गुर्जी जैसे 200 से अधिक दुर्लभ साग उपलब्ध हैं।