भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) ने दिवाला प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए नए अलर्ट जारी किए हैं। यह कदम सुभाष चंद्रा के मामले में NCLT के एक विवादित आदेश के बाद उठाया गया है जिसमें लेनदारों को मामूली भुगतान का प्रस्ताव था।
- IBBI ने दिवाला पेशेवरों (IPs) को संदिग्ध लेन-देन और कम रिकवरी पर नजर रखने का निर्देश दिया है।
- कानून का उपयोग टैक्स चोरी और जांच से बचने के लिए किए जाने की आशंका जताई गई है।
- सुभाष चंद्रा मामले में 22,000 करोड़ के दावों के बदले केवल 6.25 करोड़ के भुगतान के प्रस्ताव ने विवाद खड़ा किया।
भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (IBBI) ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण सर्कुलर जारी करते हुए दिवाला पेशेवरों (Insolvency Professionals) को सतर्क रहने की चेतावनी दी है। बोर्ड का मानना है कि दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC), 2016 का उपयोग कुछ कंपनियों द्वारा वास्तविक समाधान के बजाय अन्य अनुचित उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है।
IBBI के अनुसार, कानून प्रवर्तन और नियामक एजेंसियों से ऐसी जानकारी मिली है कि IBC का उपयोग टैक्स चोरी, नियामक जांच से बचने, बिना उचित जांच के कंपनियों के विलय या बंद करने, और संपत्तियों को सुरक्षित करने (ring-fencing) के लिए किया जा रहा है।
दुरुपयोग के 6 मुख्य संकेत
बोर्ड ने छह विशिष्ट संकेतकों की पहचान की है जिन पर पेशेवरों को कड़ी नजर रखनी चाहिए:
- बिना उचित मूल्यांकन के लेनदारों के लिए बहुत कम रिकवरी।
- क्रेडिटर्स की समिति (CoC) में किसी एक गैर-बैंकिंग लेनदार का दबदबा।
- एक ही प्रमोटर, पते या निदेशकों वाली संबंधित कंपनियों का समूह।
- विभिन्न कॉर्पोरेट देनदारों के बीच एक ही रेजोल्यूशन आवेदक की बार-बार उपस्थिति।
- कॉर्पोरेट देनदार का अन्य नियामकों द्वारा धोखाधड़ी जांच से जुड़ा होना।
- समूह कंपनियों के बीच संदिग्ध ऋण लेनदेन।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि IBC का मूल उद्देश्य समयबद्ध तरीके से कंपनियों का पुनरुद्धार करना था, लेकिन 'हेयरकट' (Haircuts) की बढ़ती प्रवृत्ति बैंकिंग प्रणाली के लिए जोखिम पैदा कर रही है। जब रिकवरी दर गिरती है, तो यह न केवल बैंकों के एनपीए को प्रभावित करता है, बल्कि वित्तीय अनुशासन को भी कमजोर करता है।
दिवाला कानून का दुरुपयोग वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र की अखंडता को खतरे में डालता है, जिससे ईमानदार लेनदारों का विश्वास कम होता है।
यह सख्ती सुभाष चंद्रा और एसेल ग्रुप से जुड़े एक मामले के बाद आई है। NCLT की एक एकल बेंच ने 22,006.57 करोड़ रुपये के दावों के मुकाबले केवल 6.25 करोड़ रुपये के पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी दे दी थी। हालांकि, बाद में NCLT की पांच सदस्यीय विशेष बेंच ने इस आदेश पर रोक लगा दी। इस मामले में आरोप था कि गैर-बैंकिंग संस्थाओं ने प्रमोटर के प्रभाव में आकर योजना को पारित किया, जबकि सार्वजनिक बैंकों ने इसका विरोध किया था।
| विवरण | सुभाष चंद्रा मामला (प्रस्तावित) | IBC औसत रिकवरी (FY22-26) |
|---|---|---|
| कुल दावा राशि | ₹22,006.57 करोड़ | विविध |
| रिकवरी/भुगतान | ₹6.25 करोड़ | ~29% (औसत) |
| रिकवरी प्रतिशत | ~0.028% | 20% (FY26 में न्यूनतम) |
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: IBBI ने दिवाला पेशेवरों को क्या करने के लिए कहा है?
उत्तर: यदि किसी पेशेवर को लगता है कि प्रक्रिया का उपयोग धोखाधड़ी या दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य के लिए किया जा रहा है, तो उन्हें तथ्यों के साथ NCLT के समक्ष आवेदन करना होगा।
प्रश्न 2: IBC का मुख्य उद्देश्य क्या है?
उत्तर: इसका उद्देश्य वित्तीय संकट वाली कंपनियों का समयबद्ध समाधान करना या उन्हें परिसमाप्त (liquidate) करना है ताकि लेनदारों को अधिकतम वसूली मिल सके।