कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि 5 साल के लंबे लिव-इन रिलेशनशिप को केवल 'शादी के झूठे वादे' के आधार पर यौन शोषण का मामला नहीं माना जा सकता। अदालत ने आपराधिक कार्यवाही को रद्द करते हुए कहा कि लंबे समय तक आपसी सहमति से रहना धोखे का संकेत नहीं है।

मुख्य बातें

  • कर्नाटक हाईकोर्ट ने 5 साल के लिव-इन रिलेशनशिप को 'शादी का झूठा वादा' मानने से इनकार किया।
  • अदालत ने कहा कि लंबे समय तक आपसी सहमति से संबंध बनाना धोखे का आधार नहीं हो सकता।
  • भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत अपराध के आवश्यक तत्व नहीं पाए गए।
  • कोर्ट ने आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट किया है कि दो वयस्कों के बीच पांच साल का सहमति से बना लिव-इन रिलेशनशिप, शादी के झूठे वादे के आधार पर यौन शोषण का अपराध स्थापित नहीं करता है। अदालत ने एक व्यक्ति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है, जिस पर शादी का झूठा वादा करके यौन संबंध बनाने का आरोप लगा था।

न्यायमूर्ति एम नगप्रसन्ना ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि एक लिव-इन रिलेशनशिप में यह मानना लगभग असंभव है कि शिकायतकर्ता केवल शादी के वादे के कारण पांच वर्षों तक यौन संबंध बनाए रखती रही। अदालत ने टिप्पणी की कि यह जानने के लिए पांच साल का समय नहीं चाहिए होता कि संबंध सहमति से हैं या किसी धोखे के कारण।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला लिव-इन रिलेशनशिप और सहमति से बने यौन संबंधों के बीच कानूनी अंतर को स्पष्ट करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि ऐसे मामलों में लंबे समय तक चलने वाले संबंधों को 'धोखा' माना जाने लगा, तो यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और न्याय का गला घोंटने जैसा होगा। यह निर्णय भविष्य में सहमति बनाम धोखे के मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।

'पांच साल का लंबा समय यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि संबंध आपसी सहमति से थे, न कि केवल शादी के किसी तात्कालिक वादे के कारण।'

मामले के तथ्यों के अनुसार, दोनों पक्ष फेसबुक के माध्यम से मिले थे और लगभग पांच वर्षों तक एक साथ रहे। आरोपी का तर्क था कि उसे बाद में पता चला कि शिकायतकर्ता पहले से ही विवाहित थी, जिसके बाद उसने संबंध तोड़ लिए। अदालत ने पाया कि शिकायत में वर्णित परिस्थितियां भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 के तहत अपराध के आवश्यक तत्वों को पूरा नहीं करती हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

भारतीय कानून में 'शादी के झूठे वादे' के तहत यौन संबंधों को अपराध मानने की परंपरा रही है, लेकिन हाल के वर्षों में न्यायपालिका ने 'सहमति' (Consent) और 'धोखे' (Deceit) के बीच की बारीक रेखा को परिभाषित करने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। यह मामला इसी कानूनी बहस का हिस्सा है कि क्या लंबे समय तक चलने वाले संबंध स्वतः ही सहमति का प्रमाण माने जा सकते हैं।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय कानून में 'सहमति' का अर्थ केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि वह मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति बिना किसी दबाव या धोखे के निर्णय लेता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. क्या लिव-इन रिलेशनशिप अवैध है?
नहीं, भारत में दो वयस्कों के बीच आपसी सहमति से लिव-इन रिलेशनशिप में रहना पूरी तरह कानूनी है।

2. BNS की धारा 69 क्या है?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 69 धोखे या शादी के झूठे वादे के माध्यम से प्राप्त यौन संबंधों को अपराध घोषित करती है।