मद्रास उच्च न्यायालय ने द्विविवाह के एक मामले में डीएनए परीक्षण के आदेश को रद्द कर दिया है, यह कहते हुए कि बच्चे की पितृत्व जांच इस मामले में अप्रासंगिक है। अदालत ने स्पष्ट किया कि डीएनए परीक्षण केवल असाधारण परिस्थितियों में ही आदेशित किया जाना चाहिए।
मुख्य बातें
- मद्रास उच्च न्यायालय ने द्विविवाह (Bigamy) के मामले में डीएनए परीक्षण का आदेश रद्द कर दिया।
- अदालत ने कहा कि बच्चे की पितृत्व (Paternity) की जांच का अपराध के निर्धारण से कोई संबंध नहीं है।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि डीएनए परीक्षण को नियमित रूप से आदेशित नहीं किया जाना चाहिए।
- धारा 494 और 495 के तहत अपराध साबित करने के लिए विवाह के छिपाव का प्रमाण आवश्यक है, न कि बच्चे की जैविक पहचान का।
मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए द्विविवाह के कथित मामले में एक व्यक्ति, उसकी पत्नी और उनके नाबालिग बच्चे के लिए डीएनए परीक्षण (DNA Testing) का आदेश देने वाले निचली अदालत के फैसले को पलट दिया है। न्यायमूर्ति मोहम्मद शफीक ने व्यवस्था दी कि बच्चे की पितृत्व की जांच का उन आरोपों से कोई लेना-देना नहीं है जिनमें पहली शादी को छिपाकर दूसरी शादी करने का आरोप लगाया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मदुरै में 24 जनवरी, 2011 को हुए एक विवाह से संबंधित है। शिकायतकर्ता महिला का आरोप था कि आरोपी व्यक्ति ने अपनी पहली शादी छिपाकर उसे धोखाधड़ी से शादी के लिए प्रेरित किया। 2018 में प्राथमिकी (FIR) दर्ज होने के बाद, मामला अदालत में पहुंचा। मुकदमे के दौरान, जब आरोपी ने यह सुझाव दिया कि वह बच्चे का जैविक पिता नहीं है, तो अभियोजन पक्ष ने पितृत्व साबित करने के लिए डीएनए परीक्षण की मांग की थी, जिसे निचली अदालत ने स्वीकार कर लिया था।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह निर्णय कानूनी प्रक्रिया में गोपनीयता और व्यक्तिगत अधिकारों के संरक्षण की दिशा में एक मील का पत्थर है। अदालत ने जोर देकर कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 494 और 495 के तहत अपराध साबित करने के लिए यह दिखाना जरूरी है कि आरोपी ने पिछली शादी को छिपाया था, न कि यह कि बच्चा किसका है। पितृत्व इस मामले में केवल एक गौण (collateral) मुद्दा है।
डीएनए परीक्षण को केवल तभी आदेशित किया जाना चाहिए जब वह विवाद को सुलझाने के लिए अपरिहार्य हो और अन्य सभी साक्ष्य माध्यम विफल हो चुके हों।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि डीएनए परीक्षण को नियमित रूप से आदेशित नहीं किया जाना चाहिए। परीक्षण का आदेश देने से पहले यह प्रदर्शित करना आवश्यक है कि परिणाम सीधे तौर पर विवाद का मुद्दा है और ऐसा करना एक 'अत्यधिक आवश्यकता' है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. द्विविवाह (Bigamy) के तहत क्या अपराध होता है?
IPC की धारा 494 के तहत, यदि कोई व्यक्ति अपने जीवनसाथी के जीवित रहते हुए दूसरी शादी करता है, तो यह अपराध है। धारा 495 इसमें और गंभीर है यदि पहली शादी को छिपाया गया हो।
2. अदालत ने डीएनए टेस्ट को क्यों खारिज किया?
अदालत के अनुसार, बच्चे की जैविक पहचान का इस बात से कोई संबंध नहीं है कि आरोपी ने अपनी पिछली शादी के बारे में झूठ बोला था या नहीं।