मुजफ्फरनगर की एक फास्ट ट्रैक कोर्ट ने महज 100 दिनों के भीतर सात अलग-अलग मामलों में 17 लोगों को मृत्युदंड सुनाया है। यह आंकड़ा पूरे उत्तर प्रदेश के वार्षिक औसत से भी अधिक है, जिससे सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
- मुजफ्फरनगर की फास्ट ट्रैक कोर्ट नंबर 3 ने 100 दिनों में 17 मृत्युदंड सुनाए।
- सुप्रीम कोर्ट के 'मनोज बनाम मध्य प्रदेश' मामले के दिशा-निर्देशों की कथित अनदेखी।
- उच्च न्यायालयों द्वारा मृत्युदंड की पुष्टि की दर बहुत कम (लगभग 10%) है।
- अभियुक्तों की मानसिक स्थिति और सुधार की संभावनाओं पर रिपोर्ट की कमी।
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में स्थित फास्ट ट्रैक कोर्ट नंबर 3 के न्यायाधीश रवि कुमार दिवाकर ने एक ऐसा कानूनी रिकॉर्ड बनाया है जिसने न्यायविदों और कानूनी विशेषज्ञों को हैरान कर दिया है। 6 अप्रैल से 17 जुलाई के बीच, यानी मात्र 100 दिनों के भीतर, इस अदालत ने सात अलग-अलग हत्या के मामलों में 22 आरोपियों में से 17 को मृत्युदंड सुनाया।
इस संख्या की गंभीरता को समझने के लिए तुलनात्मक आंकड़ों पर नजर डालना जरूरी है। NALSAR विश्वविद्यालय के स्क्वायर सर्कल क्लिनिक की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, पूरे उत्तर प्रदेश में साल भर में केवल 20 मामलों में 28 मृत्युदंड सुनाए गए थे। इसका मतलब है कि अकेले न्यायाधीश दिवाकर की अदालत ने कुछ ही महीनों में राज्य के वार्षिक औसत के आधे से अधिक सजाएं सुना दीं। यहाँ तक कि कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की कुल वार्षिक मृत्युदंड संख्या भी इस एक अदालत से कम थी।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that this sudden surge in capital punishment raises critical questions about the 'Rarest of Rare' doctrine. While the court aims for speedy justice, the omission of mitigating circumstances reports suggests a potential procedural lapse that could lead to these sentences being overturned by the High Court.
सुप्रीम कोर्ट ने 2022 के मनोज और अन्य बनाम मध्य प्रदेश राज्य मामले में स्पष्ट निर्देश दिए थे कि मृत्युदंड सुनाने से पहले अदालत को आरोपी की मनोवैज्ञानिक स्थिति, जेल में उसके व्यवहार और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि की विस्तृत रिपोर्ट लेनी चाहिए। इसका उद्देश्य यह जांचना है कि क्या अपराधी के सुधार की कोई संभावना बची है।
"मृत्युदंड केवल तब दिया जाना चाहिए जब सुधार की सारी संभावनाएं समाप्त हो चुकी हों, न कि केवल अपराध की क्रूरता के आधार पर।"
जांच में पाया गया कि मुजफ्फरनगर कोर्ट के आदेशों में ऐसी किसी रिपोर्ट का जिक्र नहीं है। इसके बजाय, न्यायाधीश ने कई मामलों में आरोपी की 'भाव-भंगिमा' (चेहरे के हाव-भाव) को सजा का आधार बनाया और कहा कि आरोपी के चेहरे पर कोई पश्चाताप नहीं दिखा। बचाव पक्ष के वकीलों ने तर्क दिया कि आरोपी गरीब मजदूर थे और छोटे बच्चों के पिता थे, लेकिन अदालत ने इन mitigating factors को पर्याप्त नहीं माना।
| क्षेत्र/कोर्ट | मृत्युदंड की संख्या | समय अवधि |
|---|---|---|
| मुजफ्फरनगर FTC No. 3 | 17 | 100 दिन |
| संपूर्ण उत्तर प्रदेश (2025) | 28 | 1 वर्ष |
| कर्नाटक (2025) | 15 | 1 वर्ष |
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धाराओं 407 से 412 के तहत, सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए किसी भी मृत्युदंड को तब तक लागू नहीं किया जा सकता जब तक कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय इसकी पुष्टि न कर दे। आंकड़ों के अनुसार, उच्च न्यायालयों द्वारा केवल 10% मृत्युदंड ही पुष्ट किए जाते हैं।
Frequently Asked Questions
1. क्या ये 17 सजाएं तुरंत लागू होंगी?
नहीं, सत्र न्यायालय की सजा को उच्च न्यायालय द्वारा पुष्ट किया जाना अनिवार्य है।
2. 'मनोज बनाम मध्य प्रदेश' केस क्या है?
यह सुप्रीम कोर्ट का वह फैसला है जो मृत्युदंड से पहले आरोपी के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक सुधार की रिपोर्ट मांगता है।