कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि 'बच्चे का सर्वोत्तम हित' का हवाला देकर कोई भी माता-पिता न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार कर एकतरफा कस्टडी या स्कूल परिवर्तन नहीं कर सकते। अदालत ने कहा कि कानून को अपने हाथ में लेना गलत है।
- न्यायालय ने कहा कि 'बच्चे का कल्याण' कानून के उल्लंघन का लाइसेंस नहीं है।
- एकतरफा कस्टडी और बिना अनुमति स्कूल बदलना अवैध माना गया।
- कोर्ट ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसने पिता को ट्रांसफर सर्टिफिकेट देने के लिए मजबूर किया था।
बेंगलुरु: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए कहा है कि कोई भी अलग रह रहा जीवनसाथी, 'बच्चे के सर्वोत्तम हित' का सहारा लेकर, न्यायिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए किसी नाबालिग की कस्टडी एकतरफा रूप से नहीं ले सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि बिना किसी आधिकारिक अदालती आदेश के बच्चे को दूसरे स्कूल में स्थानांतरित करना कानून की दृष्टि में मान्य नहीं है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला एक पति द्वारा दायर याचिका से शुरू हुआ, जिसने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उसे अपनी बड़ी बेटी के लिए ट्रांसफर सर्टिफिकेट (TC) दिलाने में सहयोग करने का निर्देश दिया गया था। पति का तर्क था कि उन्होंने 2021 में काफी प्रयासों के बाद बेटी का दाखिला केंद्रीय विद्यालय में कराया था। हालांकि, पत्नी ने पिछले साल जुलाई में बिना किसी अदालती आदेश के, बेटी को उसके स्कूल से जबरन अपने साथ ले लिया और उसे बेंगलुरु के बनशंकरी इलाके के एक नए स्कूल में नामांकित कर दिया।
न्यायालय की सख्त टिप्पणी
न्यायमूर्ति डॉ. चिलकूर सुमालथा ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि यदि इस तरह की गतिविधियों को अनुमति दी गई, तो फैमिली कोर्ट में चल रहे मामलों के पक्षकार अपनी मर्जी से काम करेंगे और बाद में 'बच्चे के सर्वोत्तम हित' का बहाना बनाकर अदालत से अपने कृत्यों को माफ करने की मांग करेंगे। अदालत ने माना कि हालांकि बच्चों का कल्याण सर्वोपरि है, लेकिन यह किसी भी पक्ष को अदालत के आदेश के बिना मनमानी करने का अधिकार नहीं देता है।
कानून का पालन करना अनिवार्य है; कल्याण के नाम पर अवैध 'सेल्फ-हेल्प' उपायों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
BozokMedia विश्लेषण
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय पारिवारिक विवादों में 'कानून को अपने हाथ में लेने' की प्रवृत्ति पर एक कड़ा प्रहार है। अक्सर देखा जाता है कि माता-पिता भावनात्मक लाभ के लिए न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करते हैं, जिससे बच्चे के जीवन में अस्थिरता पैदा होती है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक मिसाल बनेगा जहाँ कस्टडी के दावों को भावनात्मक ढाल के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
1. क्या माता-पिता बिना कोर्ट के बच्चे का स्कूल बदल सकते हैं?
नहीं, यदि मामला कस्टडी के विवाद में है, तो बिना न्यायिक अनुमति के स्कूल बदलना कानूनी रूप से जोखिम भरा हो सकता है।
2. इस फैसले का मुख्य प्रभाव क्या है?
यह फैसला सुनिश्चित करता है कि कस्टडी के विवादों में कोई भी पक्ष अदालत की प्रक्रिया का उल्लंघन न करे।