इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्रावस्ती में हुए संदिग्ध एनकाउंटर पर गंभीर सवाल उठाते हुए मामले की जांच CBI को सौंप दी है। कोर्ट ने पूछा कि 13 पुलिसकर्मी एक ही जीप में कैसे बैठे और 23 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में एक भी पुलिसकर्मी को गोली क्यों नहीं लगी?

  • इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्रावस्ती एनकाउंटर मामले में CBI जांच के आदेश दिए।
  • कोर्ट ने पुलिस के दावे पर सवाल उठाया कि 13 कर्मी एक ही जीप में कैसे समा सकते हैं।
  • 23 पुलिसकर्मियों के घेराव के बावजूद किसी भी पुलिसकर्मी को गोली क्यों नहीं लगी, यह जांच का मुख्य बिंदु है।
  • तत्कालीन एसएचओ की निशानेबाजी क्षमता की भी जांच की जाएगी।

उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले में मई 2025 में हुए एक संदिग्ध एनकाउंटर ने अब कानूनी मोड़ ले लिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने पुलिस द्वारा प्रस्तुत घटनाक्रम की सत्यता पर गंभीर संदेह जताते हुए इस पूरे मामले की जांच CBI (सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन) को सौंप दी है। अदालत के सवाल न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली पर चोट करते हैं, बल्कि एनकाउंटर की पूरी कहानी को संदिग्ध बना देते हैं।

पुलिस की कहानी में विरोधाभास

मामले की जड़ में पुलिस द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर है, जिसमें दावा किया गया था कि आरोपी अलाउद्दीन को घेरने के लिए पुलिस की एक बड़ी टीम तैनात थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस दावे की तार्किकता पर सवाल उठाए हैं। अदालत ने पूछा कि यदि मौके पर कुल 23 पुलिसकर्मी मौजूद थे और आरोपी ने फायरिंग की, तो आखिर एक भी पुलिसकर्मी को गोली क्यों नहीं लगी? यह विरोधाभास जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के सवाल दर्शाते हैं कि पुलिस द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य और घटनाक्रम के बीच एक गहरी खाई है जिसे अब केवल एक स्वतंत्र एजेंसी ही पाट सकती है।

एक अन्य चौंकाने वाला पहलू वाहन की क्षमता से जुड़ा है। पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, तत्कालीन एसएचओ अश्विनी कुमार दुबे के नेतृत्व में 13 पुलिसकर्मी एक ही जीप में सवार होकर पहुंचे थे। हाईकोर्ट ने इस पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि एक सामान्य जीप या यहाँ तक कि पुलिस की SUV में भी 13 लोगों का बैठना भौतिक रूप से असंभव है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इतने लोगों के लिए मिनी बस जैसा वाहन चाहिए होता है।

निशानेबाजी और रात का अंधेरा

मामले का तीसरा महत्वपूर्ण पहलू एसएचओ की शूटिंग क्षमता है। पुलिस का दावा है कि रात के अंधेरे में, लगभग 15 मीटर की दूरी से, केवल हथियार लोड होने की आवाज सुनकर एसएचओ ने गोली चलाई, जो सीधे आरोपी के दोनों पैरों में लगी। हाईकोर्ट ने अब सीबीआई को निर्देश दिया है कि वह तत्कालीन एसएचओ की शूटिंग और निशानेबाजी क्षमता का परीक्षण करे। क्या अंधेरे में बिना सटीक विजुअल के इतनी सटीक गोली चलाना संभव है? यह एक बड़ा सवाल है।

Why This Matters

BozokMedia analysis shows कि यह मामला केवल एक एनकाउंटर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कानून प्रवर्तन एजेंसियों की जवाबदेही और 'स्टेज्ड एनकाउंटर्स' (बनाए गए एनकाउंटर) की बढ़ती घटनाओं पर एक बड़ा प्रहार है। यदि जांच में पुलिस की कहानी गलत पाई जाती है, तो यह उत्तर प्रदेश पुलिस की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करेगा।

सवाल का विषयपुलिस का दावाहाईकोर्ट का संदेह
पुलिस कर्मियों की संख्या और वाहन13 कर्मी एक ही जीप मेंएक जीप में 13 लोग कैसे समा सकते हैं?
फायरिंग का प्रभावआरोपी ने फायरिंग की23 पुलिसकर्मियों में से किसी को गोली क्यों नहीं लगी?
निशाना और दूरी15 मीटर से सटीक निशानाअंधेरे में केवल आवाज सुनकर सटीक निशाना कैसे?
Did You Know?: कानूनी प्रक्रिया में 'हाफ एनकाउंटर' शब्द का प्रयोग अक्सर उन मामलों के लिए किया जाता है जहाँ पुलिस की जवाबी कार्रवाई पर संदेह होता है।

Frequently Asked Questions

1. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले में क्या आदेश दिया है?
कोर्ट ने मामले की जांच CBI को सौंप दी है और एसएचओ की शूटिंग क्षमता की जांच करने का निर्देश दिया है।

2. पुलिस का मुख्य दावा क्या था?
पुलिस का दावा था कि आरोपी ने फायरिंग की, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में आरोपी के पैरों में गोली लगी।