पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि धर्म का पालन करने का अधिकार पूर्ण नहीं है और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अदालत ने सीवान में एक धार्मिक जुलूस की अनुमति मांगने वाली याचिका को खारिज कर दिया है।
- धर्म का अधिकार पूर्ण नहीं है; यह सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है।
- पटना हाईकोर्ट ने सीवान के धार्मिक जुलूस से जुड़ी याचिका को खारिज किया।
- अदालत ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता को सामाजिक मानदंडों और सुरक्षा के साथ संतुलित होना चाहिए।
पटना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि धर्म को मानने और उसका अभ्यास करने का अधिकार पूर्ण (absolute) नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के हित में इस अधिकार पर 'उचित प्रतिबंध' लगाए जा सकते हैं। यह निर्णय बिहार के सीवान जिले में एक वार्षिक धार्मिक जुलूस में भीड़ की संख्या बढ़ाने की अनुमति मांगने वाली एक याचिका को खारिज करते हुए दिया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि अखाड़ा द्वारा आयोजित वार्षिक धार्मिक जुलूस में कम से कम 300 भक्तों को शामिल होने की अनुमति दी जाए। याचिका में तर्क दिया गया था कि समय के साथ भक्तों की संख्या में भारी कमी की गई है—2012-13 में जहां 200 लोग शामिल हो सकते थे, वहीं 2023 तक इसे घटाकर केवल 5 कर दिया गया। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
सुरक्षा चिंताएं और राज्य का तर्क
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि ये प्रतिबंध सुरक्षा कारणों से लगाए गए हैं। सरकार ने खुलासा किया कि हालांकि आधिकारिक तौर पर केवल 5 लोगों की अनुमति थी, लेकिन 2015 से 2022 के बीच वास्तव में 1,700 से 2,000 लोग शामिल हुए थे। सबसे गंभीर बात यह रही कि 2024 के जुलूस के दौरान भीड़ ने एक सरकारी वाहन को आग लगा दी और पुलिसकर्मियों पर पथराव किया।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला भारत में व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और राज्य की सुरक्षात्मक शक्तियों के बीच के निरंतर संघर्ष को रेखांकित करता है। यह निर्णय भविष्य के उन मामलों के लिए एक मिसाल बनेगा जहां धार्मिक परंपराओं को कानून-व्यवस्था के आधार पर चुनौती दी जाती है।
धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक संरक्षण केवल उन प्रथाओं तक सीमित है जो अनिवार्य और अभिन्न हैं, न कि उनके प्रदर्शन के हर तरीके तक।
न्यायमूर्ति आलोक कुमार की पीठ ने अपने निर्णय में कहा कि अनुच्छेद 25 और 26 धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं, लेकिन ये सार्वजनिक शांति और सामाजिक मानदंडों के अधीन हैं। अदालत ने यह भी कहा कि धार्मिक जुलूसों का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(b) के तहत आता है, लेकिन इसे दूसरों के अधिकारों के साथ सामंजस्य बिठाना चाहिए।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या धार्मिक जुलूसों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है?
हाँ, यदि प्रशासन को लगता है कि भीड़ से सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा को खतरा हो सकता है, तो उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
प्रश्न 2: पटना हाईकोर्ट ने इस मामले में क्या मुख्य टिप्पणी की?
कोर्ट ने कहा कि धार्मिक अधिकार पूर्ण नहीं हैं और उन्हें सार्वजनिक शांति और सुरक्षा के साथ संतुलित किया जाना चाहिए।