गोंडा की वरिष्ठ सिविल जज ने बताया कि विभागीय आयुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल ने मामले में हस्तक्षेप करने की कोशिश की, जिससे इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मुद्दे को आपराधिक अवमानना बेंच में भेजा। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्र जांच और आयुक्त के पदांतरण की मांग की।

  • विभागीय आयुक्त पर न्यायिक दबाव का आरोप
  • इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कृत्य को आपराधिक अवमानना बेंच में भेजा
  • सामाजिक कार्यकर्ता स्वतंत्र जांच और पदांतरण की माँग कर रहे हैं

गोंडा के वरिष्ठ सिविल जज शबिना खान ने 15 जुलाई, 2026 को अवकाश पर रहते हुए कई बार विभागीय आयुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल के कार्यालय से जुड़े नंबर से कॉल प्राप्त किए, जिससे न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठे।

जज ने बताया कि आयुक्त की कॉल में केस की प्रगति, अवकाश अवधि और अन्य बिंदुओं पर तीखी पूछताछ की गई, जिससे उन्हें दबाव महसूस हुआ। इस घटना को लेकर गोंडा में चल रहे 30‑वर्षीय जमीन विवाद को लेकर तनाव बढ़ गया।

21 अगस्त, 2026 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश सय्यद क़मर हसन रिज़वी ने कहा कि न्यायिक अधिकारी पर दबाव का आरोप हल्के में नहीं लिया जा सकता और इस मामले को आपराधिक अवमानना बेंच के समक्ष प्रस्तुत करने का आदेश दिया। उन्होंने यह भी नोट किया कि जिला जज ने 9 अगस्त को मामले को अन्य समकक्ष अदालत में स्थानांतरित कर दिया था, परन्तु टोन और भाषा ने स्पष्ट रूप से न्यायिक दबाव दर्शाया।

लखनऊ स्थित सामाजिक कार्यकर्ता अमिताभ ठाकुर ने तुरंत एक स्वतंत्र, उच्च‑स्तरीय जांच की माँग की और विभागीय आयुक्त को गोंडा (देविपाटन) विभाग से हटाने की मांग की। उन्होंने कहा, “मैंने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को पत्र लिखा है, जिसमें आयुक्त दुर्गा शक्ति नागपाल के पदांतरण और पूरी घटना की स्वतंत्र जांच की मांग की गई है।”

Why This Matters

BozokMedia analysis shows कि इस प्रकार के दबाव से न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर असर पड़ता है, और यह राज्य‑स्तरीय प्रशासनिक अधिकारियों और न्यायालय के बीच सीमाओं को स्पष्ट करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

“न्यायिक स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए किसी भी प्रकार का कार्यकारी दबाव अस्वीकार्य है,” एक वरिष्ठ विधि विशेषज्ञ ने कहा।
Did You Know?: भारत में आपराधिक अवमानना के मामलों में न्यायाधीश को अपमानित करने वाले अधिकारी को जेल तक की सजा हो सकती है।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: क्या विभागीय आयुक्त ने वास्तव में केस में हस्तक्षेप करने की कोशिश की?

उत्तर: जज के बयान और हाई कोर्ट के आदेश से संकेत मिलता है कि संभावित हस्तक्षेप हुआ था, परन्तु अंतिम निष्कर्ष अभी न्यायिक प्रक्रिया में है।

प्रश्न 2: इस मामले में किन संस्थाओं को जांच का अधिकार है?

उत्तर: हाई कोर्ट ने स्वतंत्र प्रशासनिक जांच की सिफारिश की है, जिसमें राज्य सरकार और न्यायिक निगरानी बोर्ड दोनों शामिल हो सकते हैं।