पश्चिम बंगाल में चल रहे एक बड़े रक्त तस्करी घोटाले में कोलकाता के दो प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों के छात्रों को स्वास्थ्य विभाग द्वारा पूछताछ के लिए बुलाया गया है। इस घोटाले में लैब तकनीशियनों की गिरफ्तारी के बाद अब छात्रों की भूमिका की जांच की जा रही है।
- कोलकाता के नेशनल मेडिकल कॉलेज और एनआरएस मेडिकल कॉलेज के छात्र जांच के घेरे में हैं।
- छात्र कथित तौर पर डॉक्टरों का भेष बदलकर ब्लड डोनेशन कैंपों में अवैध गतिविधियों में शामिल थे।
- पंशुरा से तीन लैब तकनीशियनों को भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (ACB) ने गिरफ्तार किया है।
- यह घोटाला नेशनल ब्लड पॉलिसी 2002 का उल्लंघन करता है।
पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य विभाग (स्वास्थ्य भवन) ने राज्य में चल रहे एक बड़े रक्त तस्करी घोटाले के संबंध में कोलकाता के कम से कम दो मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों के कई छात्रों को पूछताछ के लिए तलब किया है। बुधवार, 26 अगस्त 2026 को, चौथे वर्ष के मेडिकल छात्रों को स्वास्थ्य विभाग की समिति के समक्ष उपस्थित होना पड़ा।
सूत्रों के अनुसार, इन मेडिकल छात्रों ने डॉक्टरों का भेष धारण किया और रक्त दान शिविरों में जाकर इस अवैध नेटवर्क को सुचारू रूप से चलाने में मदद की। बताया जा रहा है कि वरिष्ठ मेडिकल छात्रों ने निजी ब्लड बैंकों के साथ मिलकर एक रैकेट चलाया, जिसमें वे भारी मात्रा में कमीशन प्राप्त कर रहे थे। जांच में शामिल छात्रों में नेशनल मेडिकल कॉलेज और नील रतन सरकार (NRS) मेडिकल कॉलेज के छात्र शामिल हैं।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह मामला केवल भ्रष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा के साथ एक गंभीर खिलवाड़ है। जब चिकित्सा के भविष्य के रक्षक ही अवैध व्यापार में लिप्त हो जाते हैं, तो यह पूरे स्वास्थ्य ढांचे की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है।
राज्य स्वास्थ्य मंत्री डॉ. शारदव मुखर्जी ने कहा, 'अधिकारियों द्वारा अनियमितताओं की जांच की जा रही है, कई जगहों पर दस्तावेजों में विसंगतियां पाई गई हैं।'
इस मामले में कार्रवाई तेज करते हुए, भ्रष्टाचार विरोधी ब्यूरो (ACB) ने पूर्व मेदिनीपुर जिले के पंशुरा से तीन लैब तकनीशियनों को गिरफ्तार किया है। इससे पहले, पुलिस ने एक बिचौलिए को भी गिरफ्तार किया था जो स्थानीय क्लबों से मात्र 100-150 रुपये में रक्तदाता कार्ड खरीदता था और फिर ब्लड बैंक से मुफ्त रक्त प्राप्त कर उसे मरीजों के परिवारों को 1,500 से 2,000 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से बेचता था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: भारत में रक्त के व्यावसायिक लेनदेन पर रोक लगाने के लिए नेशनल ब्लड पॉलिसी 2002 लागू की गई थी। इस नीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि रक्त का संग्रह केवल स्वैच्छिक आधार पर हो और इसका उपयोग केवल जीवन रक्षक कार्यों के लिए किया जाए, न कि लाभ कमाने के लिए।
जांच का दायरा अब और भी बढ़ गया है क्योंकि अधिकारियों को संदेह है कि यह एक बहु-राज्यीय घोटाला हो सकता है जिसकी कीमत करोड़ों में है। पश्चिम बंगाल से रक्त और प्लाज्मा की कई इकाइयां अन्य राज्यों में बेची गई हैं।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: यह घोटाला कैसे काम कर रहा था?
उत्तर: बिचौलिए क्लबों से सस्ते में कार्ड खरीदते थे, मुफ्त रक्त प्राप्त करते थे और फिर उसे मरीजों को ऊंचे दामों पर बेच देते थे।
प्रश्न 2: किन मेडिकल कॉलेजों के छात्र इसमें शामिल हैं?
उत्तर: मुख्य रूप से नेशनल मेडिकल कॉलेज और नील रतन सरकार मेडिकल कॉलेज के छात्र जांच के दायरे में हैं।