ओडिशा उच्च न्यायालय ने एक व्यक्ति की मौत की सज़ा को 35 साल के कारावास में बदल दिया है, जिसने अपनी पत्नी को बच्चे के जन्म के तीन दिन बाद 49 बार चाकू मारकर बेरहमी से हत्या कर दी थी और अपनी छह साल की बेटी की हत्या का प्रयास भी किया था। न्यायालय ने फैसला सुनाया कि यह मामला मौत की सज़ा के लिए 'दुर्लभतम' श्रेणी में नहीं आता है, साथ ही जीवित बची बेटियों के लिए पर्याप्त मुआवज़ा सुनिश्चित किया।

  • ओडिशा उच्च न्यायालय ने अपनी पत्नी की हत्या के दोषी व्यक्ति की मौत की सज़ा को 35 साल के कारावास में बदल दिया।
  • न्यायालय ने फैसला सुनाया कि 49 बार चाकू मारने जैसे नृशंस अपराध के बावजूद, यह मामला मौत की सज़ा के लिए 'दुर्लभतम' श्रेणी में नहीं आता।
  • न्यायमूर्ति मनाश रंजन पाठक और न्यायमूर्ति शशिकांत मिश्रा ने जीवित बची दो बेटियों के भविष्य को सुरक्षित करने की आवश्यकता पर जोर दिया और उन्हें महत्वपूर्ण मुआवज़ा दिया।

नई दिल्ली: मृत्युदंड की जटिलताओं को संबोधित करते हुए एक ऐतिहासिक फैसले में, ओडिशा उच्च न्यायालय ने अपनी पत्नी की नृशंस हत्या के दोषी एक व्यक्ति की मौत की सज़ा को कम कर दिया है। इस भयानक घटना में पति ने अपनी पत्नी को बच्चे के जन्म के ठीक तीन दिन बाद 49 बार चाकू मारकर हत्या कर दी थी, और बाद में अपनी छह साल की बेटी का गला काटने का प्रयास भी किया था। न्यायालय ने अब मृत्युदंड को 35 साल के कठोर कारावास में बदल दिया है, यह कहते हुए कि इस कृत्य की अत्यधिक बर्बरता के बावजूद, यह भारत में मृत्युदंड के लिए आवश्यक "दुर्लभतम" श्रेणी में नहीं आता है।

न्यायमूर्ति मनाश रंजन पाठक और न्यायमूर्ति शशिकांत मिश्रा की पीठ द्वारा सुने गए इस मामले ने मृत्युदंड से संबंधित गहरे कानूनी और नैतिक दुविधाओं को उजागर किया। दोषी व्यक्ति, जो अपराध के बाद फरार भी हो गया था, को निचली अदालत से मौत की सज़ा मिली थी। हालांकि, उच्च न्यायालय के 25 अगस्त को दिए गए फैसले में कहा गया कि अपराध "अत्यंत बर्बर, क्रूर" था, लेकिन यह "दुर्लभतम" सिद्धांत के कड़े मानदंडों को पूरा नहीं करता था, जो यह अनिवार्य करता है कि मृत्युदंड केवल उन्हीं मामलों के लिए आरक्षित हो जहां आजीवन कारावास का विकल्प निस्संदेह बंद हो गया हो।

न्यायिक विचार-विमर्श और बच्चों का कल्याण

पीठ ने बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष दोनों की दलीलों पर सावधानीपूर्वक विचार किया। बचाव पक्ष के वकील ने तर्क दिया कि कई बार चाकू मारने के बावजूद, अधिकांश चोटें शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर नहीं थीं, जो पूर्व-योजना या निश्चित मकसद की कमी का संकेत देती हैं। उन्होंने तर्क दिया कि यह कृत्य एक घरेलू झगड़े से उत्पन्न हो सकता है जो अस्थायी पागलपन या अनियंत्रित क्रोध की स्थिति में बढ़ गया। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने दोषी के पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड की कमी और हिरासत में अनुकरणीय आचरण को सुधार और पुनर्वास की संभावना के संकेतक के रूप में इंगित किया।

इसके विपरीत, राज्य ने मृत्युदंड के लिए जोरदार तर्क दिया, जिसमें आरोपी द्वारा प्रदर्शित असाधारण विकृति और क्रूरता पर जोर दिया गया। उन्होंने प्रसव के तीन दिन बाद मां की अत्यधिक भेद्यता और छह साल की बेटी की हत्या के भयावह प्रयास को उजागर किया, जिसकी प्रत्यक्षदर्शी गवाही महत्वपूर्ण थी। अभियोजन पक्ष ने आरोपी की अपनी मां के सामने कबूलनामे, मेडिकल रिपोर्ट और उसके उंगलियों के निशान वाले खून से सने चाकू सहित सबूत पेश किए, यह दावा करते हुए कि ये कारक सामूहिक रूप से मामले को "दुर्लभतम" के रूप में योग्य बनाते हैं।

उच्च न्यायालय के फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू दो जीवित बची बेटियों, जिनकी उम्र 10 और चार साल है, के भविष्य पर केंद्रित था। न्यायालय ने उनके माता-पिता की अनुपस्थिति में उनके भविष्य को सुरक्षित करने की अनिवार्यता पर जोर दिया। यह स्वीकार करते हुए कि "कोई भी मौद्रिक मुआवज़ा उनके नुकसान और जीवन भर के दर्द को कम नहीं कर सकता," न्यायालय ने फिर भी राज्य को पर्याप्त वित्तीय सहायता प्रदान करने का निर्देश दिया। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) द्वारा पहले से ही दिए गए 5 लाख रुपये के अतिरिक्त, न्यायालय ने प्रत्येक बेटी को 10 लाख रुपये अतिरिक्त देने का आदेश दिया, जिसे उनके वयस्क होने तक सावधि जमा में रखा जाएगा, जिसका उद्देश्य उन्हें यथासंभव सम्मानजनक जीवन बनाने में मदद करना है।

यह क्यों मायने रखता है

बोज़ोकमीडिया विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय मृत्युदंड के प्रति भारत के सतर्क दृष्टिकोण को पुष्ट करता है, जो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित "दुर्लभतम" सिद्धांत को रेखांकित करता है। यह अंतिम सज़ा देने से पहले सुधार की संभावना सहित एक मामले के हर पहलू की जांच करने के लिए न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को उजागर करता है। यह निर्णय व्यापक पीड़ित मुआवज़े और सहायता की महत्वपूर्ण आवश्यकता को भी सामने लाता है, विशेष रूप से जघन्य अपराधों से आघातग्रस्त बच्चों के लिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि न्याय केवल सज़ा से परे होकर उन लोगों के कल्याण को भी शामिल करता है जो अपरिवर्तनीय रूप से प्रभावित हुए हैं।

"ओडिशा उच्च न्यायालय का यह फैसला एक कठोर अनुस्मारक है कि जबकि एक अपराध की क्रूरता विवेक को झकझोर सकती है, मृत्युदंड के लिए कानूनी सीमा असाधारण रूप से उच्च बनी हुई है, जो सबसे गंभीर मामलों में भी पुनर्वास और सुधार की क्षमता को प्राथमिकता देती है," एक प्रमुख कानूनी विद्वान ने टिप्पणी की।
क्या आप जानते हैं?: भारत में मृत्युदंड के लिए "दुर्लभतम" सिद्धांत 1980 के सर्वोच्च न्यायालय के बच्चन सिंह बनाम पंजाब राज्य मामले से उत्पन्न हुआ था, जिसका उद्देश्य मृत्युदंड के आवेदन को असाधारण परिस्थितियों तक सीमित करना था।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: भारतीय कानून में "दुर्लभतम" सिद्धांत क्या है?
उ1: "दुर्लभतम" सिद्धांत भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित एक कानूनी सिद्धांत है, जो यह निर्धारित करता है कि मृत्युदंड केवल असाधारण मामलों में दिया जाना चाहिए जहां किया गया अपराध इतना जघन्य और सामूहिक विवेक को झकझोरने वाला हो कि आजीवन कारावास सहित कोई अन्य सज़ा पर्याप्त न हो।

प्रश्न 2: पीड़िता के बच्चों को क्या मुआवज़ा दिया गया?
उ2: न्यायालय ने राज्य को दो बेटियों में से प्रत्येक को 10 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया, इसके अतिरिक्त जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) द्वारा पहले से ही दिए गए 5 लाख रुपये भी शामिल हैं। यह कुल राशि उनके वयस्क होने तक सावधि जमा में रखी जाएगी ताकि उनके भविष्य को सुरक्षित किया जा सके।