कर्नाटक सरकार एक ऐसी नीति तैयार कर रही है जिससे जीवित दाता किसी अनजान और जरूरतमंद व्यक्ति को अंग दान कर सकेंगे। उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद यह कदम उठाया गया है ताकि कानूनी देरी को कम कर मरीजों की जान बचाई जा सके।
- कर्नाटक सरकार अज्ञात प्राप्तकर्ताओं के लिए परोपकारी अंग दान के दिशा-निर्देश बना रही है।
- यह कदम एक व्यवसायी की याचिका और कानूनी देरी को कम करने के अदालती आदेशों के बाद उठाया गया है।
- निजी अस्पतालों को ऐसे दान की सुविधा देने की अनुमति नहीं होगी; राज्य सरकार एकमात्र प्राधिकरण होगी।
स्वास्थ्य सेवाओं की सुलभता बढ़ाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए, कर्नाटक सरकार ने उच्च न्यायालय को सूचित किया है कि वह जीवित दाताओं द्वारा किसी जरूरतमंद अज्ञात प्राप्तकर्ता को अंग दान करने की अनुमति देने वाली एक व्यापक नीति बनाने पर विचार कर रही है। इस पहल को 'परोपकारी दान' (Altruistic Donation) कहा जाता है, जिसका उद्देश्य उन हजारों मरीजों को जीवनदान देना है जिनके पास दान के लिए कोई संबंधित रिश्तेदार या मित्र नहीं है।
यह घटनाक्रम तब सामने आया जब कर्नाटक उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार से इस संबंध में एक औपचारिक प्रणाली स्थापित करने का आग्रह किया। वर्तमान में, परोपकारी दाताओं को अक्सर अनुमति समितियों से मंजूरी पाने के लिए कानूनी संघर्ष करना पड़ता है, जो स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में ऐसे अनुरोधों को खारिज कर देते हैं। राज्य-led नीति के माध्यम से, सरकार का लक्ष्य दाताओं को हर मामले में अदालत जाने की मजबूरी से मुक्त करना है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि अंग प्रत्यारोपण में वर्तमान नौकरशाही बाधाएं अक्सर मरीज के स्वास्थ्य को और खराब कर देती हैं, क्योंकि कानूनी मंजूरी मिलने में लंबा समय लगता है। अस्पताल-आधारित समितियों से प्राधिकरण को हटाकर एक केंद्रीकृत राज्य नीति पर स्थानांतरित करने से, कर्नाटक 'प्रत्यारोपण के समय' (time-to-transplant) को काफी कम कर सकता है। यह बदलाव न केवल चिकित्सा प्रक्रिया को मानवीय बनाता है, बल्कि अंगों के व्यवसायीकरण के खिलाफ एक कानूनी सुरक्षा कवच भी प्रदान करता है।
"परोपकारी दान के लिए एक मानकीकृत राज्य नीति प्रत्यारोपण पारिस्थितिकी तंत्र को कानूनी बाधाओं से हटाकर एक सुव्यवस्थित जीवन रक्षक तंत्र में बदल देगी।"
इस चर्चा की शुरुआत दावणगेरे के एक 52 वर्षीय व्यवसायी की याचिका से हुई, जो किसी अनजान जरूरतमंद व्यक्ति को अपनी एक किडनी दान करना चाहते थे। अदालत ने पहले ही उन्हें पात्रता जांच के लिए विक्टोरिया अस्पताल, बेंगलुरु के नेफ्रोलॉजी संस्थान में उपस्थित होने का निर्देश दिया है।
ऐतिहासिक रूप से, अदालत पहले ही एक मिसाल कायम कर चुकी है। 25 नवंबर, 2025 को, उच्च न्यायालय ने बेंगलुरु के एक 58 वर्षीय डॉक्टर को परोपकारी रूप से अपनी किडनी दान करने की अनुमति दी थी, जिसके बाद उनके अनुरोध को अस्पताल की समिति ने खारिज कर दिया था। इस मामले ने उस प्रणालीगत कमी को उजागर किया जिसे नई नीति भरने का प्रयास कर रही है।
| विशेषता | वर्तमान प्रणाली | प्रस्तावित नीति |
|---|---|---|
| अनुमोदन प्रक्रिया | अस्पताल-आधारित समितियां (अक्सर अस्वीकृत) | राज्य-led दिशा-निर्देश/नीति |
| दाता की पहुंच | अदालती हस्तक्षेप की आवश्यकता | सीधा प्रशासनिक मार्ग |
| समय सीमा | लंबी कानूनी देरी | त्वरित प्रक्रिया |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: प्रस्तावित नीति के तहत परोपकारी दाता कौन हो सकता है?
कोई भी स्वस्थ जीवित व्यक्ति जो बिना किसी मुआवजे के और प्राप्तकर्ता के साथ पूर्व संबंध के बिना अंग दान करना चाहता है।
प्रश्न 2: निजी अस्पताल इन दानों की सुविधा क्यों नहीं दे सकते?
अंगों की अवैध बिक्री को रोकने और सख्त नैतिक निरीक्षण सुनिश्चित करने के लिए, अदालत ने फैसला सुनाया है कि केवल राज्य सरकार ही अज्ञात दान को विनियमित करने के लिए उपयुक्त प्राधिकरण है।