कर्नाटक उच्च न्यायालय ने आरटीआई अधिनियम के तहत अधिकारियों पर लगाए गए जुर्माने का विवरण मांगने वाले एक कार्यकर्ता की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने इसे कानून का 'दुरुपयोग' करार देते हुए कहा कि तुच्छ आवेदनों से वास्तविक आवेदकों को परेशानी होती है।
- कर्नाटक हाईकोर्ट ने आरटीआई कार्यकर्ता रमेश बाबू एन की याचिका को खारिज कर दिया।
- अदालत ने आरटीआई अधिनियम के तहत 'फिशिंग इंक्वायरी' और कानून के दुरुपयोग की कड़ी निंदा की।
- न्यायालय ने स्पष्ट किया कि हालांकि आरटीआई एक लाभकारी कानून है, लेकिन इसका उपयोग व्यक्तिगत लाभ या परेशान करने के लिए नहीं किया जा सकता।
बेंगलुरु: कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसले में एक सामाजिक कार्यकर्ता द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता रमेश बाबू एन ने उन सार्वजनिक सूचना अधिकारियों (PIOs) के विवरण और उनसे वसूले गए जुर्माने की जानकारी मांगी थी, जिन्होंने आरटीआई अधिनियम के तहत सूचना देने में विफलता दिखाई थी।
न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि कर्नाटक सूचना आयोग इस तरह के विवरण नहीं रखता है। अदालत ने इस बात पर गहरी नाराजगी जताई कि याचिकाकर्ता यह बताने में असमर्थ रहा कि वह यह जानकारी आखिर क्यों चाहता है। जब याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि वह एक 'जन-हितैषी व्यक्ति' है, तो अदालत ने इसे पर्याप्त आधार नहीं माना।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला आरटीआई संस्कृति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। जहाँ एक ओर आरटीआई पारदर्शिता का हथियार है, वहीं दूसरी ओर 'प्रोफेशनल एक्टिविस्ट्स' द्वारा इसका उपयोग अधिकारियों को डराने या अनावश्यक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि अब केवल 'जनहित' का दावा करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि सूचना मांगने के पीछे एक ठोस और तर्कसंगत उद्देश्य होना चाहिए।
आरटीआई अधिनियम का उद्देश्य शासन में पारदर्शिता लाना है, न कि इसे अधिकारियों के खिलाफ एक व्यक्तिगत हथियार या 'फिशिंग एक्सपेडिशन' के रूप में उपयोग करना।
अदालत ने आरटीआई अधिनियम की धारा 6(2) का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है कि आवेदक को सूचना मांगने का कारण बताने की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, न्यायमूर्ति गोविंदराज ने स्पष्ट किया कि जब आवेदन 'तुच्छ या परेशान करने वाला' (frivolous or vexatious) हो, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि कुछ लोगों द्वारा किए गए इस दुरुपयोग के कारण वास्तविक आवेदकों को देरी का सामना करना पड़ता है।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि राज्य सूचना आयोग ने पहले ही नौ ऐसे व्यक्तियों को ब्लैकलिस्ट किया है, जिन्होंने 45,000 लंबित अपीलों में से आधे से अधिक दायर की थीं। यह दर्शाता है कि एक छोटा समूह पूरी व्यवस्था को पंगु बनाने का प्रयास कर रहा है।
Frequently Asked Questions
1. क्या आरटीआई आवेदन के लिए कारण बताना अनिवार्य है?
सामान्यतः धारा 6(2) के तहत कारण बताना जरूरी नहीं है, लेकिन यदि अदालत या आयोग को लगता है कि आवेदन कानून का दुरुपयोग है, तो वे उद्देश्य पूछ सकते हैं।
क्योंकि याचिकाकर्ता ने बिना किसी ठोस शोध या प्रकाशन उद्देश्य के केवल अधिकारियों के जुर्माने की सूची मांगी थी, जिसे अदालत ने 'फिशिंग इंक्वायरी' माना।