केरल उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि यदि पत्नी की आयु 18 वर्ष से कम है, तो विवाह आरोपी को POCSO अधिनियम के तहत आपराधिक दायित्व से मुक्त नहीं करता है। अदालत ने अपहरण और बलात्कार के आरोपों को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी।

  • यदि पीड़ित 18 वर्ष से कम है, तो विवाह POCSO अधिनियम के तहत अभियोजन से छूट नहीं देता।
  • नाबालिगों से जुड़े धार्मिक विवाहों की वैधता का निर्णय ट्रायल कोर्ट द्वारा किया जाएगा।
  • यदि पत्नी 15 से 18 वर्ष के बीच है, तो IPC के बलात्कार अपवाद पति पर लागू नहीं होते।

एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम करते हुए, केरल उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम, 2012 के तहत अभियोजन के लिए विवाह कोई बाधा नहीं है, बशर्ते पीड़ित की आयु 18 वर्ष से कम हो। जस्टिस जोबिन सेबस्टियन ने एक आरोपी द्वारा दायर उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें अपहरण, बलात्कार और बाल अश्लीलता सामग्री रखने के गंभीर आरोपों को रद्द करने की मांग की गई थी।

यह मामला एक ऐसे आरोपी के इर्द-गिर्द घूमता है जिसने तर्क दिया कि उसने शिकायतकर्ता से, जब वह 17 वर्ष एक महीने की थी, इस्लामी धार्मिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाह किया था। बचाव पक्ष ने भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत बलात्कार के अपवाद का सहारा लेने की कोशिश की, यह तर्क देते हुए कि अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाना बलात्कार नहीं है। हालांकि, अदालत ने इस संकीर्ण व्याख्या को खारिज कर दिया और POCSO के तहत बच्चों को दिए गए वैधानिक संरक्षण को प्राथमिकता दी।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह फैसला बाल विवाह के मामलों में इस्तेमाल किए जाने वाले एक गंभीर कानूनी लूपहोल (खामी) को बंद करता है। विवाह की 'धार्मिक वैधता' को POCSO के तहत 'अपराधिक दायित्व' से अलग करके, अदालत ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि जब यौन अपराधों की बात आती है, तो 18 वर्ष से कम आयु के बच्चे की कानूनी परिभाषा किसी भी प्रथागत या धार्मिक प्रथा से ऊपर है।

अभियोजन पक्ष ने बताया कि लड़की का कथित तौर पर कार में अपहरण किया गया और उसे आरोपी के निवास पर ले जाया गया। मामले की गंभीरता को बढ़ाते हुए, आरोपी के माता-पिता पर भी अपराध में सहायता करने का आरोप है, जबकि लड़की के अपने माता-पिता पर आरोप है कि उन्होंने मामले की जानकारी होने के बावजूद अधिकारियों को रिपोर्ट नहीं किया।

"POCSO अधिनियम का वैधानिक अधिदेश पूर्ण है; यह 18 वर्ष से कम आयु के प्रत्येक बच्चे के लिए एक सुरक्षा कवच बनाता है, चाहे कोई भी कथित वैवाहिक बंधन हो।"

अदालत ने पाया कि आरोपी ने विवाह साबित करने के लिए शिकायतकर्ता, उसके भाई और मस्जिद के काजी के बयानों का सहारा लिया। हालांकि, अदालत ने कहा कि विवाह कानूनी रूप से हुआ था या नहीं, यह तय करना ट्रायल कोर्ट का काम है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि भले ही धार्मिक रीति-रिवाजों से विवाह हुआ हो, यह आरोपी को आपराधिक दायित्व से नहीं बचाएगा क्योंकि पीड़िता कानूनन एक बच्ची थी।

ऐतिहासिक रूप से, भारतीय अदालतों में व्यक्तिगत कानूनों और धर्मनिरपेक्ष आपराधिक कानूनों के बीच टकराव रहा है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह स्थापित किया है कि यदि पत्नी 15 से 18 वर्ष के बीच है, तो पति पर बलात्कार का मुकदमा चलाया जा सकता है, और केरल उच्च न्यायालय ने इसी मिसाल का पालन किया है।

क्या आप जानते हैं?: POCSO अधिनियम एक लिंग-तटस्थ (gender-neutral) कानून है, जिसका अर्थ है कि यह यौन शोषण और उत्पीड़न से सभी बच्चों की रक्षा करता है, चाहे उनका लिंग कुछ भी हो।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या पति पर POCSO के तहत मामला चलाया जा सकता है यदि पत्नी 17 वर्ष की है?
हाँ, केरल उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, 18 वर्ष से कम आयु का कोई भी व्यक्ति बच्चा है, और विवाह पति को POCSO आरोपों से नहीं बचाता।

2. क्या भारत में धार्मिक कानून POCSO अधिनियम से ऊपर हैं?
नहीं, POCSO जैसे आपराधिक कानून धर्मनिरपेक्ष हैं और बच्चों के संरक्षण के मामले में व्यक्तिगत या धार्मिक कानूनों पर प्राथमिकता रखते हैं।