केरल उच्च न्यायालय ने नशे में धुत यात्रियों को हटाने के रेलवे के अधिकार को सही ठहराते हुए कहा है कि सार्वजनिक सुरक्षा और यात्रियों की सुविधा व्यक्तिगत स्वतंत्रता से ऊपर है। न्यायालय ने रेलवे अधिनियम की धारा 145(a) को संवैधानिक माना है।
- केरल उच्च न्यायालय ने नशे में धुत व्यक्तियों को हटाने की अनुमति देने वाली रेलवे अधिनियम की धारा 145(a) को बरकरार रखा।
- अदालत ने कहा कि तत्काल निष्कासन के लिए रक्त परीक्षण (Blood Test) की मांग करना अव्यावहारिक है।
- मनमाने कार्यों को रोकने के लिए रेलवे बोर्ड के दिशा-निर्देशों में विशिष्ट व्यवहार संबंधी संकेत दिए गए हैं।
- यात्री की स्वतंत्रता के दावों के मुकाबले सार्वजनिक सुरक्षा और सुविधा को प्राथमिकता दी गई।
केरल उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए रेलवे कर्मचारियों के उस अधिकार को बरकरार रखा है, जिसके तहत नशे की हालत में पाए गए यात्रियों को ट्रेनों या रेलवे परिसर से हटाया जा सकता है। अदालत ने फैसला सुनाया कि रेलवे अधिनियम की धारा 145(a) न तो मनमानी है और न ही असंवैधानिक, और यह प्रावधान सार्वजनिक व्यवस्था और यात्रियों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है।
यह कानूनी मामला तब शुरू हुआ जब एक टूर और ट्रैवल कंपनी के प्रबंध निदेशक के एन शास्त्री ने इस कानून को चुनौती देते हुए एक याचिका दायर की। शास्त्री का तर्क था कि "नशे की स्थिति" (state of intoxication) शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, जिससे रेलवे अधिकारियों को अत्यधिक विवेकाधीन शक्तियां मिल जाती हैं। उन्होंने दावा किया कि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन है।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह फैसला सार्वजनिक परिवहन में प्रशासनिक शक्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है। नैदानिक रक्त परीक्षणों के बजाय ब्रेथ एनालाइजर और शारीरिक अवलोकन के उपयोग को मान्य करके, अदालत ने "सुरक्षा की तत्काल आवश्यकता" को "पूर्ण साक्ष्य प्रमाण" से ऊपर रखा है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि रेलवे अधिकारी चिकित्सा नौकरशाही में फंसे बिना अपराधों या दुर्घटनाओं को रोकने के लिए तेजी से कार्रवाई कर सकते हैं।
सुनवाई के दौरान, जस्टिस बेचू कुरियन थॉमस ने उल्लेख किया कि किसी यात्री को हटाने से पहले रक्त परीक्षण की आवश्यकता होना पूरी तरह से अव्यावहारिक होगा, क्योंकि ऐसे परीक्षणों में कई घंटे लगते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यवस्था बनाए रखने के लिए किसी व्यक्ति को हटाना और बाद में कानूनी तौर पर दोषी ठहराना, दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
व्यवहार संबंधी मूल्यांकन को न्यायिक समर्थन देना परिवहन अधिकारियों को सार्वजनिक परिवहन पर महिलाओं और बच्चों जैसे कमजोर वर्गों के लिए सुरक्षित वातावरण बनाए रखने के लिए सशक्त बनाता है।
रेलवे ने अपने पक्ष का समर्थन करते हुए कई घटनाओं का हवाला दिया, जिनमें नशे में धुत व्यक्तियों द्वारा महिला यात्रियों पर हमला करने या ट्रेन से गिरकर मृत्यु होने के मामले शामिल थे। रेलवे ने तर्क दिया कि परिसर में होने वाले अधिकांश अपराधों में आरोपी नशे की हालत में पाए गए थे, जिससे निवारक कार्रवाई आवश्यक हो गई है।
अदालत ने 14 सितंबर, 2023 को रेलवे बोर्ड द्वारा जारी एक सुरक्षा परिपत्र (Circular) पर भी भरोसा किया। इन दिशा-निर्देशों के अनुसार, कार्रवाई करने से पहले अधिकारियों को लाल आंखें, लड़खड़ाती बोली, आक्रामक व्यवहार और शराब की गंध जैसे संकेतों की जांच करनी होगी, ताकि इस शक्ति का दुरुपयोग न हो।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: क्या रेलवे मुझे केवल थोड़ी मात्रा में शराब पीने के लिए हटा सकता है?
उत्तर: अदालत और रेलवे बोर्ड के दिशा-निर्देश कहते हैं कि निष्कासन "नशे की स्थिति" पर आधारित होता है जो व्यवहार और सुरक्षा को प्रभावित करे, न कि केवल शराब के सेवन पर।
प्रश्न 2: क्या ट्रेन से हटाए जाने से पहले ब्लड टेस्ट अनिवार्य है?
उत्तर: नहीं। केरल उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि यात्री को हटाने के लिए ब्रेथ एनालाइजर और शारीरिक अवलोकन पर्याप्त हैं।