सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सुधांशु धूलिया ने संवैधानिक अधिकारों में सहिष्णुता की भूमिका पर जोर दिया और कहा कि लोकतंत्र को बचाने के लिए विश्वविद्यालयों में स्वतंत्र असहमति का होना अनिवार्य है।
- जस्टिस धूलिया ने संस्थागत दबाव के बजाय व्यक्तिगत पसंद और संवैधानिक स्वतंत्रता की वकालत की।
- उन्होंने 'सहिष्णुता' को भारतीय संविधान के एक आधारभूत स्तंभ के रूप में रेखांकित किया।
- न्यायाधीश ने भाषाई विविधता के महत्व पर जोर देते हुए 'हिंदुस्तानी' भाषा के ऐतिहासिक संदर्भ को याद किया।
- उन्होंने तर्क दिया कि विश्वविद्यालय बौद्धिक असहमति और आलोचनात्मक सोच के केंद्र होने चाहिए।
द इंडियन एक्सप्रेस के साथ एक विस्तृत बातचीत में, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश सुधांशु धूलिया ने कानून, मानवतावाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अंतर्संबंधों पर अपने विचार साझा किए। इलाहाबाद उच्च न्यायालय से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के अपने सफर में, जस्टिस धूलिया ने हमेशा संस्थागत अतिक्रमण के मुकाबले संवैधानिक विकल्पों की रक्षा करने का प्रयास किया है।
सहिष्णुता का दर्शन और हिजाब विवाद
शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब विवाद पर चर्चा करते हुए, जस्टिस धूलिया ने सहिष्णुता नामक मौलिक संवैधानिक मूल्य की ओर इशारा किया। बिजोय इमैनुएल बनाम केरल राज्य के ऐतिहासिक मामले का हवाला देते हुए, उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय संस्कृति और संविधान सह-अस्तित्व की भावना पर आधारित हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह व्यक्तिगत रूप से हिजाब के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन कानूनी लड़ाई हिजाब के बारे में नहीं, बल्कि महिला की पसंद के बारे में है कि वह इसे पहनना चाहती है या नहीं।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के हालिया फैसले पर असहमति जताते हुए उन्होंने कहा कि जोर संस्थागत नियमों पर नहीं, बल्कि व्यक्ति की चुनने की स्वतंत्रता पर होना चाहिए।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia विश्लेषण दर्शाता है कि जस्टिस धूलिया का दृष्टिकोण 'मानव-केंद्रित न्यायशास्त्र' की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव है। संस्थागत एकरूपता के बजाय 'पसंद के अधिकार' को प्राथमिकता देकर, उनके विचार सार्वजनिक स्थानों पर राज्य-प्रायोजित सांस्कृतिक एकरूपता के बढ़ते चलन को चुनौती देते हैं।
"हमारा धर्म सहिष्णुता का उपदेश देता है, हमारी संस्कृति सहिष्णुता सिखाती है, हमारा भारत का संविधान सहिष्णुता का अभ्यास करता है; आइए हम इसे कम न होने दें।"
भाषाई बहुलवाद और 'गंगा-जमुनी तहजीब'
जस्टिस धूलिया ने भारत में भाषा की राजनीति, विशेष रूप से महाराष्ट्र में मराठी और गैर-मराठी भाषियों के बीच तनाव पर भी बात की। उन्होंने संविधान सभा की बहसों को याद करते हुए कहा कि विभाजन के बाद उर्दू को 'दुश्मन देश की भाषा' के रूप में गलत तरीके से देखा गया, जिससे हिंदुस्तानी (हिंदी और उर्दू का मिश्रण) का ह्रास हुआ।
गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपने अनुभव को साझा करते हुए, उन्होंने नागालैंड की विभिन्न जनजातीय भाषाओं का उल्लेख किया और भारत को एक "भाषाई सभ्यता" बताया। उन्होंने तर्क दिया कि भाषा संस्कृति का प्रतिबिंब है और इसे विभाजन का कारण नहीं बनना चाहिए।
अकादमिक असहमति की पवित्रता
जस्टिस धूलिया के विमर्श का एक मुख्य केंद्र विश्वविद्यालय की भूमिका है। उनका मानना है कि विश्वविद्यालय का प्राथमिक उद्देश्य एक ऐसा वातावरण बनाना है जहाँ छात्र और शिक्षक बिना किसी डर के तीखी और स्वतंत्र असहमति व्यक्त कर सकें। यदि सत्ता पर सवाल उठाने की क्षमता समाप्त हो जाती है, तो विश्वविद्यालय सीखने के केंद्र के बजाय केवल विचारधारा थोपने के साधन बन जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: हिजाब के संबंध में जस्टिस धूलिया का मुख्य तर्क क्या था?
उनका तर्क हिजाब के धार्मिक समर्थन के बजाय 'पसंद के अधिकार' और संवैधानिक सहिष्णुता पर आधारित था।
प्रश्न 2: जस्टिस धूलिया विश्वविद्यालयों में असहमति को क्यों आवश्यक मानते हैं?
उनका मानना है कि बौद्धिक विकास और लोकतांत्रिक स्वास्थ्य इस बात पर निर्भर करता है कि लोग सवाल पूछने और असहमत होने के लिए कितने स्वतंत्र हैं।