कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि किसी रिश्ते का खत्म होना या शादी का न हो पाना, आपसी सहमति से बनाए गए शारीरिक संबंधों को अपराध में नहीं बदल देता। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल शादी का वादा पूरा न होने पर इसे बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।

  • कर्नाटक हाईकोर्ट ने बलात्कार और धोखाधड़ी के मामले में आरोपी को बरी करते हुए कार्यवाही रद्द कर दी।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि सहमति से बने संबंधों का अंत होने पर उसे अपराध नहीं माना जा सकता।
  • शादी का वादा पूरा न होना तब तक बलात्कार नहीं है जब तक कि शुरुआत से ही धोखा देने का इरादा न हो।

कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक ऐतिहासिक फैसले में बलात्कार और धोखाधड़ी के आरोपों में घिरे एक व्यक्ति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की कि यदि कोई रिश्ता आपसी सहमति से बना था और बाद में खराब हो गया या उसमें शादी नहीं हो पाई, तो उसे स्वचालित रूप से आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता।

यह मामला दो कॉलेज के साथियों के बीच के संबंधों से जुड़ा था, जो लगभग दो वर्षों तक साथ रहे। बाद में महिला ने आरोप लगाया कि शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे के आधार पर बनाए गए थे। हालांकि, अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री प्रथम दृष्टया बलात्कार के अपराध को स्थापित करने में विफल रही।

कानूनी पहलू और सुप्रीम कोर्ट के संदर्भ

मामले की सुनवाई के दौरान, शिकायतकर्ता ने मामले को आगे न बढ़ाने और आरोपी के साथ समझौता करने की इच्छा व्यक्त की थी। हालांकि, उच्च न्यायालय ने नोट किया कि चूंकि आरोप बलात्कार जैसे गंभीर अपराध से जुड़े थे, इसलिए केवल समझौता होने के आधार पर कार्यवाही को समाप्त नहीं किया जा सकता था। इसके बजाय, अदालत ने मामले की मेरिट और उपलब्ध साक्ष्यों की गहन जांच की।

अदालत ने अपने निर्णय में सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण निर्णयों, जैसे कि ध्रुवरम मुरलीधर सोनार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) और उदय बनाम कर्नाटक राज्य (2003) का हवाला दिया। इन फैसलों ने यह स्थापित किया है कि शादी का वादा करना और फिर उसे पूरा न कर पाना, अपने आप में यह सिद्ध नहीं करता कि महिला की सहमति गलत तथ्य की गलतफहमी के तहत ली गई थी।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय निजी जीवन और आपराधिक कानून के बीच की महीन रेखा को परिभाषित करता है। यह कानूनी प्रणाली में एक महत्वपूर्ण संतुलन बनाता है ताकि वास्तविक यौन हिंसा के पीड़ितों को न्याय मिले, जबकि आपसी सहमति से बने रिश्तों के टूटने को आपराधिक मामला बनाने की प्रवृत्ति पर रोक लगे।

शादी का वादा टूटना और शादी के धोखे से शारीरिक संबंध बनाना, दो अलग-अलग कानूनी स्थितियां हैं।

अदालत ने समधान बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) के हालिया फैसले पर भी भरोसा किया। अदालत ने जोर देकर कहा कि यदि कोई शारीरिक संबंध लंबे समय तक भावनात्मक रूप से जुड़े रिश्तों के बीच बना रहता है, तो उसे केवल इसलिए बलात्कार नहीं माना जा सकता क्योंकि रिश्ता अंततः शादी में नहीं बदला।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी मामले में जबरदस्ती, यौन हिंसा या शादी का ऐसा वादा किया गया हो जो शुरू से ही झूठा था, तो उन्हें आपराधिक कानून के तहत पूर्ण सुरक्षा मिलनी चाहिए। लेकिन, ऐसे आरोपों के लिए ठोस सबूतों और विश्वसनीय परिस्थितियों का होना अनिवार्य है।

Did You Know?: भारतीय कानून के तहत, 'सहमति' और 'धोखे से ली गई सहमति' के बीच का अंतर मामले के शुरुआती इरादे (Intent) पर निर्भर करता है।

Frequently Asked Questions

1. क्या शादी का वादा पूरा न करना बलात्कार माना जाता है?
नहीं, यदि संबंध आपसी सहमति से शुरू हुए थे और बाद में रिश्ता टूट गया, तो इसे बलात्कार नहीं माना जाएगा। केवल तभी यह अपराध है जब पुरुष का इरादा शुरू से ही धोखा देने का हो।

2. क्या समझौता होने पर बलात्कार का मामला खत्म हो जाता है?
नहीं, अदालत के अनुसार बलात्कार एक गंभीर अपराध है, इसलिए केवल समझौता होने से मामला स्वतः समाप्त नहीं होता; अदालत को साक्ष्यों के आधार पर जांच करनी पड़ती है।