पंजाब पुलिस ने सीमा पार से संचालित होने वाले एक बड़े जासूसी नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है, जिसमें दुकानों के बाहर लगे सौर ऊर्जा संचालित कैमरों का उपयोग सेना की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए किया जा रहा था।

  • ISI से जुड़े एजेंटों ने दुकानों के बाहर सौर ऊर्जा संचालित 4G कैमरों का जाल बिछाया था।
  • इन कैमरों का उपयोग सैन्य ठिकानों, छावनियों और रेलवे स्टेशनों की लाइव फीड भेजने के लिए किया जा रहा था।
  • पकड़े गए आरोपियों को पाकिस्तान और दुबई स्थित हैंडलर्स द्वारा भारी भुगतान किया जा रहा था।
  • पुलिस अब सिम कार्ड और डिवाइस आईडी के जरिए पूरे नेटवर्क को खंगाल रही है।

पंजाब पुलिस ने एक बेहद संवेदनशील जासूसी मॉड्यूल का पर्दाफाश करते हुए राज्य में सुरक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा पैदा करने वाले एक नेटवर्क को ध्वस्त किया है। पिछले छह महीनों में यह पांचवां मामला है जहां ISI (पाकिस्तान स्थित खुफिया एजेंसी) से जुड़े एजेंटों ने व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बाहर सौर ऊर्जा से चलने वाले और सिम कार्ड युक्त सीसीटीवी कैमरों का उपयोग करके भारतीय सेना और सुरक्षा बलों की गतिविधियों पर नज़र रखने की कोशिश की।

डीजीपी गौरव यादव के अनुसार, नवीनतम छापेमारी में 23 में से 22 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस ने मौके से 11 कैमरे, सोलर प्लेट्स, सिम कार्ड, मोबाइल फोन, राउटर और अडैप्टर जैसे उपकरण जब्त किए हैं। इस मामले में कपूरथला, अमृतसर, बठिंडा, पठानकोट, बरनाला और लुधियाना सहित विभिन्न जिलों में ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत आठ एफआईआर दर्ज की गई हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह केवल स्थानीय अपराध नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित 'हाइब्रिड वॉरफेयर' का हिस्सा है। जासूसों द्वारा उपयोग किए जा रहे ये कैमरे 'ऑफ-ग्रिड' हैं, यानी इन्हें बिजली के तारों की आवश्यकता नहीं होती, जिससे इन्हें पहचानना बेहद मुश्किल हो जाता है। ये कैमरे सीधे विदेशी हैंडलर्स को लाइव फीड भेजते हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा है।

तकनीकी रूप से उन्नत ये सौर-संचालित कैमरे बिना किसी तार के सैन्य मार्गों की जासूसी करने के लिए एक घातक हथियार बन गए हैं।

जांच में सामने आया है कि ये मॉड्यूल अक्सर कम लागत वाले चीनी उपकरणों का उपयोग करते हैं। अप्रैल में दिल्ली पुलिस ने भी इसी तरह के एक मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया था, जो दिल्ली कैंट और सोनीपत रेलवे स्टेशनों के पास सैन्य साइटों की तस्वीरें और जीपीएस डेटा साझा कर रहा था। इसके बाद गृह मंत्रालय (MHA) ने देशभर में सीसीटीवी ऑडिट के आदेश दिए हैं।

जासूसी का यह तरीका बेहद संगठित है। स्थानीय इंस्टॉलरों को पाकिस्तान से जुड़े हैंडलर्स द्वारा एक कैमरा लगाने के बदले 35,000 से 40,000 रुपये तक दिए जाते हैं। लुधियाना-फिरोजपुर रोड के मामले में, एक आरोपी को तो तीन लाख रुपये तक का भुगतान किया गया था। ये अपराधी अक्सर दुकानों को मुखौटा बनाकर सेना की छावनियों के पास अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

Did You Know?: ये जासूसी कैमरे मोबाइल ऐप और क्लाउड प्लेटफॉर्म के माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने से लाइव देखे जा सकते हैं।

Frequently Asked Questions

1. ये जासूसी कैमरे सामान्य सीसीटीवी से कैसे अलग हैं?
ये कैमरे सौर ऊर्जा से चलते हैं और इनमें सिम कार्ड लगा होता है, जिससे इन्हें बिजली के कनेक्शन की जरूरत नहीं होती और ये इंटरनेट के माध्यम से सीधे विदेश में बैठे हैंडलर्स को डेटा भेजते हैं।

2. पुलिस अब आगे क्या कदम उठा रही है?
पुलिस सिम कार्ड, डिवाइस आईडी और तकनीकी ट्रेल के माध्यम से उन सभी हैंडलर्स और स्थानीय सहयोगियों की पहचान करने में जुटी है जो इस नेटवर्क को चला रहे हैं।