कर्नाटक उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि कर्मचारियों को बिना किसी वैध कारण या पूर्व अनुमति के अनुपस्थित रहने का कोई अधिकार नहीं है। न्यायालय ने बीएमटीसी कंडक्टर की बर्खास्तगी के फैसले को सही ठहराते हुए अनुशासन बनाए रखने पर जोर दिया है।
- बिना अनुमति के अनुपस्थिति को औद्योगिक रोजगार में 'दुराचार' माना जाता है।
- कर्मचारियों के पास छुट्टी लेने का कोई पूर्ण या निरपेक्ष अधिकार नहीं है।
- कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बीएमटीसी कंडक्टर की बर्खास्तगी के फैसले को बरकरार रखा।
- न्यायालय ने अनुशासनहीनता के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि सहानुभूति के आधार पर नियमों को नहीं बदला जा सकता।
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ड्यूटी से बिना किसी वैध कारण के अनुपस्थित रहना अनुशासन का उल्लंघन है। न्यायालय ने बेंगलुरु महानगर परिवहन निगम (BMTC) के एक पूर्व कंडक्टर की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसकी बर्खास्तगी को चुनौती दी गई थी। कंडक्टर पर लगभग चार महीने तक बिना किसी पूर्व सूचना या अनुमति के ड्यूटी से अनुपस्थ रहने का आरोप था।
न्यायमूर्ति ज्योति एम ने श्रम न्यायालय के पिछले आदेश की पुष्टि करते हुए कहा, "एक कर्मचारी को निर्धारित कार्य घंटों के दौरान वैध कारणों के बिना काम से अनुपस्थित नहीं होना चाहिए। औद्योगिक रोजगार में अनधिकृत अनुपस्थिति को दुराचार माना जाता है और इसके लिए अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।" न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि कर्मचारियों के पास छुट्टी लेने का कोई 'पूर्ण अधिकार' नहीं है और बिना अनुमोदन के अनुपस्थित रहना सीधे तौर पर अनुशासनहीनता की श्रेणी में आता है।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह निर्णय सार्वजनिक सेवा और कॉर्पोरेट जगत के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करता है। यह स्पष्ट करता है कि कार्यस्थल पर अनुशासन और समय की पाबंदी केवल नीतिगत नियम नहीं हैं, बल्कि कानूनी बाध्यता भी हैं। यदि कर्मचारी अपनी मनमानी छुट्टी को अधिकार समझने लगेंगे, तो इससे पूरे संस्थान की कार्यक्षमता और सेवा वितरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
अनधिकृत अनुपस्थिति केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि यह रोजगार अनुबंध और अनुशासन का गंभीर उल्लंघन है जिसे कानूनन अनदेखा नहीं किया जा सकता।
मामले के विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता 1992 में कंडक्टर के रूप में सेवा में शामिल हुआ था। उस पर 1 सितंबर से 24 दिसंबर 2014 तक अनुपस्थित रहने का आरोप था। जांच के दौरान, यह पाया गया कि उसने आरोप पत्र का कोई जवाब नहीं दिया था, जिसके परिणामस्वरूप उसके खिलाफ एकपक्षीय कार्यवाही की गई और 6 मई 2015 को उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
न्यायालय ने यह भी गौर किया कि याचिकाकर्ता का इतिहास बार-बार अनुपस्थित रहने का रहा है; वह पहले भी 17 बार बिना सूचना के अनुपस्थित पाया गया था। जिरह के दौरान, कंडक्टर ने स्वयं स्वीकार किया कि वह सितंबर 2014 से अनुपस्थित था। इन तथ्यों को देखते हुए, अदालत ने पाया कि श्रम न्यायालय का निर्णय पूरी तरह से उचित और न्यायसंगत था।
अन्य महत्वपूर्ण न्यायिक मिसालें
यह मामला केवल बीएमटीसी तक सीमित नहीं है। हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी एक डीटीसी ड्राइवर की बर्खास्तगी को बरकरार रखा था, जिसने 1988 में सात महीने तक अनुपस्थिति दिखाई थी। इसी तरह, राजस्थान उच्च न्यायालय ने भी स्पष्ट किया कि सरकारी शिक्षकों के लिए 'चाइल्ड केयर लीव' (CCL) कोई अधिकार नहीं है, बल्कि यह नियोक्ता के विवेक पर निर्भर करता है।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: क्या कर्मचारी को छुट्टी लेना कानूनी अधिकार है?
उत्तर: नहीं, कानून के अनुसार छुट्टी लेना नियोक्ता के विवेक पर निर्भर करता है और यह कर्मचारी का 'निरपेक्ष अधिकार' नहीं है।
प्रश्न 2: बिना सूचना के अनुपस्थित रहने पर क्या कार्रवाई हो सकती है?
उत्तर: अनधिकृत अनुपस्थिति को दुराचार माना जाता है, जिसके लिए चेतावनी, निलंबन या सेवा से बर्खास्तगी जैसी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।