आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को एक महिला की विरासत राशि जारी करने का निर्देश दिया है, जिसे बैंक ने 23 वर्षों तक बिना किसी ठोस कानूनी आधार के रोक रखा था।
- एपी हाईकोर्ट ने एसबीआई को 23 साल से रुके एफसीएनआर (FCNR) डिपॉजिट जारी करने का आदेश दिया।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आंध्र प्रदेश में वसीयत का प्रोबेट (Probate) अनिवार्य नहीं है।
- संसद ने 2025 में देशभर में प्रोबेट की आवश्यकता को समाप्त कर दिया है।
- बैंक 23 वर्षों के बाद भी किसी अन्य दावेदार का प्रमाण पेश करने में विफल रहा।
उपभोक्ता अधिकारों और विरासत कानून की दिशा में एक महत्वपूर्ण फैसले में, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने भारतीय स्टेट बैंक (SBI) को निर्देश दिया है कि वह एक महिला को उसके दिवंगत एनआरआई भाई के विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (FCNR) जमा और अन्य निवेशों में उसका हिस्सा तुरंत जारी करे। यह राशि 2003 में निष्पादक की मृत्यु के बाद से पिछले 23 वर्षों से बैंक द्वारा रोक कर रखी गई थी।
जस्टिस रवि चीमलपति की अध्यक्षता वाली इस सुनवाई में 1995 में की गई एक वसीयत पर विचार किया गया। मृतक एनआरआई ने अपनी संपत्ति का दो-तिहाई हिस्सा अपने बेटे को और शेष एक-तिहाई हिस्सा अपनी चार बहनों के बीच समान रूप से वितरित करने का निर्देश दिया था। जबकि एक बहन ने उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त कर 2007 में अपना 19 लाख रुपये का हिस्सा ले लिया था, लेकिन बैंक ने याचिकाकर्ता सेखरामंतरी प्रमिला और उनकी अन्य बहनों को भुगतान करने से इनकार कर दिया।
एसबीआई का मुख्य तर्क 'प्रोबेट' (अदालत द्वारा वसीयत का सत्यापन) आदेश की मांग करना था। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि आंध्र प्रदेश में प्रोबेट अनिवार्य नहीं था। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि भारतीय संसद ने 2025 में देशभर में प्रोबेट की आवश्यकता को समाप्त कर दिया है, जिससे बैंक की मांग पूरी तरह से निराधार हो गई।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि यह फैसला सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के भीतर मौजूद उस कठोर नौकरशाही को उजागर करता है, जहां पुराने दस्तावेजीकरण के नाम पर कानूनी जनादेशों की अनदेखी की जाती है। एक नागरिक को उपभोक्ता फोरम और बैंकिंग लोकपाल के चक्कर लगाने पर मजबूर करना बैंक की गंभीर विफलता को दर्शाता है।
"जब अन्य वारिसों को भुगतान किया जा चुका हो, तब भी एक वैध वसीयत के आधार पर भुगतान रोकने का निर्णय मौलिक संपत्ति अधिकारों का घोर उल्लंघन है।"
अदालत ने पाया कि 23 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी बैंक वसीयत के निष्पादक की पत्नी या बेटे द्वारा किसी भी प्रतिकूल दावे की जानकारी नहीं दे सका। याचिकाकर्ता के वकील एडवोकेट सारंग अफजुलपुरकर ने तर्क दिया कि बैंक का यह व्यवहार भारतीय संविधान द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता की आयु और वसीयत पर किसी भी सक्रिय विवाद की अनुपस्थिति को देखते हुए, अदालत ने एसबीआई को एक क्षतिपूर्ति बॉन्ड (Indemnity Bond) प्राप्त करने के बाद उनका हकदार हिस्सा जारी करने का आदेश दिया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. क्या भारत में सभी वसीयतों के लिए प्रोबेट अनिवार्य है?
नहीं, 2025 के संसदीय बदलावों और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के कानूनों के अनुसार, सभी मामलों में संपत्ति जारी करने के लिए प्रोबेट अनिवार्य नहीं है।
2. FCNR डिपॉजिट क्या होता है?
विदेशी मुद्रा गैर-निवासी (FCNR) खाते विदेशी मुद्रा में रखे जाने वाले सावधि जमा (Term Deposits) होते हैं, जो विशेष रूप से अनिवासी भारतीयों (NRIs) के लिए बनाए गए हैं।