बॉम्बे हाई कोर्ट ने पुणे फैमिली कोर्ट के उस फैसले को पलट दिया है जिसमें एक नाबालिग बच्चे की अंतरिम कस्टडी सिंगापुर में रहने वाले पिता को दी गई थी। कोर्ट ने निचली अदालत की 'रूढ़िवादी' सोच की कड़ी आलोचना की है।

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने पुणे में रहने वाली माँ से बच्चे की कस्टडी छीनकर सिंगापुर में रहने वाले पिता को देने के आदेश को रद्द कर दिया।
  • कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा 'रूढ़िवादी' और 'नैतिक उपदेशों' के आधार पर निर्णय लेने की आलोचना की।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे का पुणे में स्थापित जीवन और भावनात्मक संबंध पिता के अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण हैं।

बाल कल्याण और न्यायिक आचरण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में, बॉम्बे हाई कोर्ट ने पुणे फैमिली कोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया है जिसमें एक नाबालिग लड़के की अंतरिम कस्टडी उसके पिता को सौंपने और उसे सिंगापुर भेजने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस आशीष सी चव्हाण की पीठ ने कहा कि निचली अदालत ने बच्चे के जीवन की निरंतरता और स्थिरता पर विचार नहीं किया।

यह मामला 2012 में विवाह करने वाले एक जोड़े के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। सिंगापुर में रहने के बाद, मार्च 2025 में माँ बच्चे के साथ पुणे लौट आई थी। पिता ने सिंगापुर की फैमिली जस्टिस कोर्ट और भारत में हैबियस कॉर्पस याचिकाओं के माध्यम से कस्टडी की मांग की थी। पुणे फैमिली कोर्ट ने शुरू में पिता के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बच्चे को सिंगापुर भेजने का आदेश दिया था।

यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला न्यायिक व्यक्तिपरकता (subjectivity) पर एक कड़ा प्रहार है। फैमिली कोर्ट द्वारा एक 'पवित्र पत्नी' के कर्तव्यों पर 'उपदेश' देने की आलोचना करके, हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वैवाहिक विवाद और लैंगिक अपेक्षाएं बच्चे के 'सर्वोत्तम हित' के कानूनी निर्धारण में बाधा नहीं बननी चाहिए। यह मिसाल कायम करता है कि पारंपरिक विचारों के बजाय बच्चे की भावनात्मक और शैक्षिक स्थिरता सर्वोपरि है।

हाई कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश ने कहावतों का उपयोग किया और माँ के खिलाफ तीखी टिप्पणियां कीं, विशेष रूप से उसे परिवार की 'बहू' कहकर संबोधित किया। कोर्ट ने पाया कि निचली अदालत ने चुनिंदा रूप से माँ की गलतियों पर ध्यान केंद्रित किया, जबकि इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया कि बच्चा जून 2025 से पुणे के एक स्कूल में अच्छी तरह से बस चुका है।

कस्टडी तय करते समय बच्चे का कल्याण एकमात्र और सर्वोपरि विचार होना चाहिए; माता-पिता के बीच कानूनी लड़ाई किसी अभिभावक को अयोग्य नहीं बनाती।

अदालत ने आगे कहा कि बच्चे के अपने नाना-नानी और पुणे में विस्तारित परिवार के साथ मजबूत भावनात्मक संबंध हैं। बिना किसी पूर्ण परीक्षण या मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन के, अंतरिम स्तर पर बच्चे को सिंगापुर स्थानांतरित करना उसके मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना गया।

क्या आप जानते हैं?: 'गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट' के तहत, भारतीय अदालतें माता-पिता के कानूनी अधिकारों के बजाय 'बच्चे के कल्याण' को प्राथमिकता देती हैं।
कारक फैमिली कोर्ट का नजरिया हाई कोर्ट का नजरिया
मुख्य फोकस माता-पिता के कर्तव्य और वैवाहिक स्थिति बच्चे का कल्याण और स्थिरता
तर्क का आधार रूढ़िवादी/नैतिक उपदेश साक्ष्य-आधारित/मनोवैज्ञानिक
स्थान प्राथमिकता सिंगापुर (पिता) पुणे (माँ)

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'बच्चे का सर्वोत्तम हित' (Best Interest of the Child) सिद्धांत क्या है?
यह एक कानूनी मानक है जहाँ अदालत कस्टडी तय करने के लिए माता-पिता की इच्छाओं के बजाय बच्चे की भावनात्मक, शारीरिक और शैक्षिक जरूरतों का मूल्यांकन करती है।

2. क्या पिता के खिलाफ कानूनी मामला दर्ज करने से माँ की कस्टडी प्रभावित होती है?
नहीं, जैसा कि इस मामले में स्थापित हुआ, माता-पिता के बीच कानूनी विवाद किसी अभिभावक को कस्टडी से वंचित नहीं करते, बशर्ते बच्चे का कल्याण सुनिश्चित हो।