पटना उच्च न्यायालय ने बीमारी के कारण अनुपस्थित रहने पर एसबीआई अधिकारी को जबरन इस्तीफा देने के लिए मजबूर करने वाले बैंक के फैसले को पलट दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कर्मचारी को गुलाम की तरह नहीं माना जा सकता।

  • पटना हाईकोर्ट ने बीमारी के कारण सेवा छोड़ने पर मजबूर किए गए SBI अधिकारी को बहाल करने का आदेश दिया।
  • अदालत ने कहा कि बैंक ने चिकित्सा दस्तावेजों की अनदेखी की और निष्पक्ष अवसर नहीं दिया।
  • अधिकारी को सेवा की निरंतरता मिलेगी, लेकिन अनुपस्थिति अवधि का वेतन नहीं दिया जाएगा।

पटना उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में भारतीय स्टेट बैंक (SBI) के एक डिप्टी मैनेजर, पंकज कुमार सिंह को बहाल करने का आदेश दिया है। बैंक ने यह दावा किया था कि अधिकारी ने स्वेच्छा से सेवा छोड़ दी है, जिसे 'इस्तीफे' के रूप में माना गया। हालांकि, अदालत ने पाया कि अधिकारी गंभीर बीमारी से जूझ रहे थे और बैंक का रवैया अनुचित था।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस हरीश कुमार ने टिप्पणी की कि एक कर्मचारी को "गुलाम" की तरह नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि हालांकि बिना बताए लंबी अनुपस्थिति को सेवा का त्याग माना जा सकता है, लेकिन इस मामले में अधिकारी के पास वैध चिकित्सा कारण थे जिन्हें बैंक ने नजरअंदाज किया।

मामले की विस्तृत पृष्ठभूमि

पंकज कुमार सिंह ने नवंबर 1989 में क्लर्क के रूप में SBI जॉइन किया था और अपनी मेहनत से 2011 तक डिप्टी मैनेजर के पद तक पहुंचे। जून 2019 में मुजफ्फरपुर जोन में पोस्टिंग के दौरान उन्हें गंभीर पीलिया (Jaundice) हुआ, जिसके बाद उन्हें 45 दिनों के पूर्ण आराम की सलाह दी गई। उन्होंने HRMS पोर्टल के माध्यम से छुट्टी के लिए आवेदन किया था, जिसे शुरू में स्वीकृत माना गया था।

इलाज के दौरान उन्हें पैरों में गंभीर दर्द की समस्या हुई, जिसके कारण उन्हें अक्टूबर 2019 से दिसंबर के मध्य तक निजी क्लिनिक में भर्ती रहना पड़ा। जब वह 16 दिसंबर को ड्यूटी पर लौटे, तो उन्हें बताया गया कि उनकी छुट्टी अस्वीकार कर दी गई है और 7 दिसंबर से उन्हें सेवा से इस्तीफा देने वाला मान लिया गया है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह फैसला कॉर्पोरेट और बैंकिंग क्षेत्र में 'वर्क कल्चर' और मानवीय दृष्टिकोण की आवश्यकता को रेखांकित करता है। अक्सर बड़े संस्थान नियमों की आड़ में कर्मचारियों के स्वास्थ्य अधिकारों की अनदेखी करते हैं। यह निर्णय एक मिसाल है कि प्रशासनिक नियमों से ऊपर प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का सिद्धांत है।

"यह निर्णय स्पष्ट करता है कि चिकित्सा आपात स्थिति में प्रशासनिक औपचारिकताएं किसी कर्मचारी के आजीविका के अधिकार को नहीं छीन सकतीं।"

अदालत ने पाया कि अधिकारी के पास 270 दिनों की अर्जित छुट्टी (Earned Leave) उपलब्ध थी। इसके बावजूद बैंक ने बिना किसी उचित कारण के उनकी छुट्टी खारिज कर दी और उन्हें अपनी बात रखने का मौका भी नहीं दिया।

पक्ष मुख्य तर्क
SBI बैंक अधिकारी 90 दिनों से अधिक अनुपस्थित रहे, जो अनुशासनहीनता है।
अधिकारी (याचिकाकर्ता) गंभीर बीमारी और मेडिकल सर्टिफिकेट के आधार पर छुट्टी ली गई थी।
क्या आप जानते हैं?: भारतीय श्रम कानूनों और सेवा नियमों के तहत, 'सेवा का त्याग' (Abandonment of Service) साबित करने के लिए नियोक्ता को यह दिखाना होता है कि कर्मचारी ने वास्तव में काम छोड़ने का इरादा किया था, न कि वह किसी मजबूरी में था।

Frequently Asked Questions

1. क्या अधिकारी को अनुपस्थिति अवधि का वेतन मिलेगा?
नहीं, अदालत ने स्पष्ट किया है कि उन्हें सेवा की निरंतरता (Continuity of Service) मिलेगी, लेकिन उस अवधि का वेतन या भत्ता नहीं दिया जाएगा जब उन्होंने वास्तव में काम नहीं किया।

p>2. अदालत ने बैंक के फैसले को क्यों रद्द किया?
क्योंकि बैंक ने चिकित्सा दस्तावेजों की सत्यता की जांच नहीं की और अधिकारी को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का निष्पक्ष अवसर नहीं दिया।