दिल्ली उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि चलती ट्रेन में ऊपरी बर्थ से यात्री का गिरना 'अनहोनी घटना' है, भले ही पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण हृदय गति रुकना बताया गया हो।

  • दिल्ली हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल के मुआवजे से इनकार करने वाले आदेश को रद्द किया।
  • चलती ट्रेन की ऊपरी बर्थ से गिरना रेलवे अधिनियम की धारा 123(c)(2) के तहत 'अनहोनी घटना' (Untoward Incident) माना गया है।
  • केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर मुआवजे से इनकार नहीं किया जा सकता, जब तक कि पहले से मौजूद बीमारी साबित न हो।

यात्री सुरक्षा और कानूनी जवाबदेही पर जोर देते हुए, दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया है कि चलती ट्रेन के अंदर ऊपरी बर्थ से किसी यात्री का दुर्घटनावश गिरना केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृत्यु का कारण कोई अन्य चिकित्सीय कारण, जैसे कि हार्ट अटैक बताया गया है। न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी ने कहा कि ऊपरी बर्थ से गिरना रेलवे अधिनियम के तहत एक "अनहोनी घटना" है।

यह मामला 10 नवंबर 2015 का है, जब संजीव कुमार अपने पिता के साथ इटावा से आगरा कैंट जा रहे थे। आगरा स्टेशन के पास ट्रेन में अचानक आए एक झटके के कारण संजीव ऊपरी बर्थ से गिर गए और बेहोश हो गए। रेलवे डॉक्टर ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। आगरा के जिला अस्पताल में हुए पोस्टमार्टम में मृत्यु का कारण "मायोकार्डियल इन्फार्क्शन" (हार्ट अटैक) बताया गया था।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला रेलवे को मुआवजे के दावों से बचने के लिए चिकित्सा तकनीकी शब्दों का उपयोग करने से रोकता है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि 'मृत्यु के कारण' और 'उस घटना' के बीच अंतर है जिसने मृत्यु को प्रेरित किया। यह उन हजारों यात्रियों के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल है जो रेलवे की बुनियादी ढांचे की खामियों (जैसे अचानक झटका लगना) के कारण दुर्घटना का शिकार होते हैं।

'अनहोनी घटना' की कानूनी परिभाषा दुर्घटना के घटित होने पर केंद्रित है, न कि उस जैविक विफलता पर जो उस दुर्घटना के कारण उत्पन्न हुई हो।

रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल ने सितंबर 2022 में केवल पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर मुआवजे के दावे को खारिज कर दिया था। हालांकि, उच्च न्यायालय ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो कि संजीव पहले से किसी हृदय रोग से पीड़ित थे। अदालत ने इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि चूंकि यात्री कमर दर्द के इलाज के लिए जा रहा था, इसलिए वह शारीरिक रूप से कमजोर था।

अदालत ने अब इस मामले को वापस ट्रिब्यूनल को भेज दिया है ताकि कानून के अनुसार मुआवजे की राशि का निर्धारण किया जा सके और निर्देश दिया है कि आदेश की प्रति मिलने के दो महीने के भीतर भुगतान किया जाए।

क्या आप जानते हैं?: रेलवे अधिनियम की धारा 123(c)(2) विशेष रूप से ट्रेन से किसी यात्री के दुर्घटनावश गिरने को एक ऐसी 'अनहोनी घटना' मानती है जिसके लिए मुआवजा देय है।

तुलना: ट्रिब्यूनल बनाम उच्च न्यायालय का दृष्टिकोण

विशेषतारेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनलदिल्ली उच्च न्यायालय
मुख्य साक्ष्यपोस्टमार्टम (हार्ट अटैक)घटना (बर्थ से गिरना)
वर्गीकरणप्राकृतिक मृत्युअनहोनी घटना
परिणामदावा खारिजमुआवजे का आदेश

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: रेलवे अधिनियम के तहत 'अनहोनी घटना' क्या है?
इसमें ट्रेन से गिरना या ट्रेन की चपेट में आना जैसी दुर्घटनाएं शामिल हैं, जो यात्री या उनके परिवार को मुआवजे की पात्रता देती हैं।

प्रश्न 2: क्या हार्ट अटैक मुआवजे के दावे को खारिज कर सकता है?
इस फैसले के अनुसार, नहीं। जब तक रेलवे यह साबित न कर दे कि पहले से मौजूद बीमारी के कारण यात्री गिरा, तब तक गिरने की घटना को ही आधार माना जाएगा।