पटना उच्च न्यायालय ने बिहार की एक सरकारी शिक्षिका की बर्खास्तगी को रद्द करते हुए कहा कि 19 साल पहले कम उम्र में की गई नियुक्ति को केवल एक 'अनियमितता' माना जा सकता है, सजा का आधार नहीं।
- पटना हाईकोर्ट ने 2003 में नियुक्त शिक्षिका की 2022 की बर्खास्तगी को रद्द किया।
- अदालत ने माना कि बिना जालसाजी के कम उम्र में नियुक्ति केवल एक 'अनियमितता' है।
- शिक्षिका अनुच्छेद 311 के तहत संरक्षण और पिछले वेतन (back wages) की हकदार हैं।
पटना उच्च न्यायालय ने बिहार की एक सरकारी शिक्षिका माला कुमारी के पक्ष में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है, जिन्हें 2022 में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था। अदालत ने कहा कि 2003 में नियुक्ति के समय शिक्षिका की उम्र केवल 16 वर्ष और पांच महीने थी, जिसे 19 साल बाद सजा का आधार बनाना "न्याय का उपहास" है।
यह मामला जन्म तिथि (DOB) को लेकर विवाद से जुड़ा था। शिक्षिका के स्कूल रिकॉर्ड में जन्म तिथि 10 सितंबर 1984 थी, जबकि बिहार स्कूल परीक्षा बोर्ड द्वारा जारी मैट्रिक प्रमाण पत्र में यह 10 सितंबर 1986 दर्ज थी। इसी आधार पर राज्य अधिकारियों ने आरोप लगाया कि उन्होंने नौकरी पाने के लिए दस्तावेजों में हेरफेर किया और उन्हें बर्खास्त कर दिया।
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला प्रशासनिक लापरवाही और "आनुपातिकता के सिद्धांत" पर एक बड़ी मिसाल कायम करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि दस्तावेजों के सत्यापन की जिम्मेदारी नियुक्त करने वाले प्राधिकरण की होती है। यदि राज्य नियुक्ति के समय सत्यापन करने में विफल रहता है, तो वह दशकों बाद किसी लिपिकीय त्रुटि के लिए कर्मचारी को दंडित नहीं कर सकता।
"अपीलकर्ता को वर्ष 2022 में, यानी नियुक्ति के 19 साल बाद, उस गलती के लिए दंडित नहीं किया जा सकता जिसे राज्य को 2003 में ही पकड़ लेना चाहिए था।"
न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह और न्यायमूर्ति सौरेंद्र पांडे की पीठ ने जोर देकर कहा कि इस मामले में जालसाजी या छेड़छाड़ का कोई सबूत नहीं मिला है। अदालत ने पाया कि यह जन्म तिथि को लेकर एक "वास्तविक विवाद" था और शिक्षिका ने नौकरी पाने के लिए कोई धोखाधड़ी नहीं की थी। इसलिए, उन्हें भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311 के तहत संवैधानिक संरक्षण मिलना चाहिए।
हालांकि, अदालत ने सेवानिवृत्ति की अवधि को लेकर संतुलित रुख अपनाया। बर्खास्तगी रद्द करते हुए भी, कोर्ट ने सेवा विस्तार के लिए 1984 की जन्म तिथि को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने आदेश दिया कि मैट्रिक प्रमाण पत्र की 1986 वाली तिथि को ही आधिकारिक माना जाएगा, जिससे 2020 के नियमों के तहत उनकी कुल सेवा अधिकतम 42 वर्ष होगी।
प्रश्न 1: अदालत ने कम उम्र में नियुक्ति को 'महज एक अनियमितता' क्यों कहा?
क्योंकि इसमें कोई जालसाजी या जानबूझकर की गई धोखाधड़ी नहीं थी; यह केवल दो आधिकारिक दस्तावेजों के बीच का अंतर था, और राज्य नियुक्ति के समय सत्यापन करने में विफल रहा था।
प्रश्न 2: क्या शिक्षिका को उनका बकाया वेतन मिलेगा?
हाँ, अदालत ने आदेश दिया है कि वह उस अवधि के लिए पिछले वेतन (back wages) की हकदार हैं जिसमें उन्हें काम करने से रोका गया था।