पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 'यारियां 2' फिल्म के एक गीत के खिलाफ दर्ज एफआईआर को यह कहते हुए रद्द कर दिया कि फिल्म के दृश्यों से सिख समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं था। कोर्ट ने इसे रचनात्मक स्वतंत्रता का हिस्सा माना।
- पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने 'यारियां 2' गीत से संबंधित एफआईआर को रद्द किया।
- अदालत ने माना कि गैर-अमृतधारी व्यक्ति द्वारा 'श्री साहिब' पहनना जानबूझकर किया गया अपमान नहीं था।
- कोर्ट ने रचनात्मक स्वतंत्रता और कलात्मक अभिव्यक्ति को प्राथमिकता दी।
पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हाल ही में 2023 की फिल्म 'यारियां 2' के निर्माताओं को बड़ी राहत देते हुए एक एफआईआर को रद्द कर दिया। यह मामला फिल्म के एक गीत के दृश्यों से जुड़ा था, जिसके बारे में आरोप लगाया गया था कि इसने सिख समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि फिल्म में दिखाए गए दृश्य रचनात्मक स्वतंत्रता और कलात्मक प्रवृत्ति का हिस्सा थे, न कि किसी समुदाय को अपमानित करने का कोई जानबूझकर किया गया प्रयास।
न्यायाधीश शालिनी सिंह नागपाल ने अपने अवलोकन में कहा कि एक सामान्य और तर्कसंगत व्यक्ति के लिए इस कृत्य को अत्यधिक अपमानजनक या उकसाने वाला नहीं माना जा सकता। अदालत ने 7 सितंबर के अपने फैसले में उल्लेख किया कि एक गैर-अमृतधारी सिख को 'श्री साहिब/किरपान' पहने हुए दिखाना सिख धर्म का अपमान नहीं कहा जा सकता।
Why This Matters
BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह फैसला भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक संवेदनशीलता के बीच के संतुलन को रेखांकित करता है। यह स्पष्ट करता है कि अज्ञानता या रचनात्मक त्रुटि को तब तक 'अपराध' नहीं माना जा सकता जब तक कि उसमें दुर्भावना (malice) सिद्ध न हो। यह फिल्म निर्माताओं के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल है कि अनजाने में हुई गलतियों के लिए माफी और सुधार को अदालतें सकारात्मक रूप से देखती हैं।
"कलात्मक अभिव्यक्ति और धार्मिक आस्थाओं के बीच टकराव के मामलों में, अदालतें अब 'इरादे' (Intent) को सबसे महत्वपूर्ण कारक मानती हैं।"
इस मामले की पृष्ठभूमि यह थी कि एक व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई थी कि T-Series द्वारा जारी गीत में अभिनेता नीज़ान जाफरी को बिना दाढ़ी-मूंछ (clean-shaven) के 'श्री साहिब' पहने दिखाया गया है, जो सिख परंपराओं के विरुद्ध है। शिकायतकर्ता का तर्क था कि श्री साहिब '5 ककारों' में से एक है और इसे केवल अमृतधारी सिखों द्वारा ही पहना जाना चाहिए।
प्रतिवादियों (निर्देशकों राधिका राव और विनय सप्रू) के वकीलों ने तर्क दिया कि यह चित्रण धार्मिक रीति-रिवाजों के ज्ञान की कमी के कारण हुआ था, न कि अपमान करने के उद्देश्य से। उन्होंने यह भी बताया कि विवादित दृश्यों को हटा दिया गया है और निर्माताओं ने अपनी गलती के लिए माफी मांगी है।
दूसरी ओर, डिप्टी अटॉर्नी जनरल हरदीप सिंह वधवा ने तर्क दिया कि बिना पगड़ी और बिना दाढ़ी के श्री साहिब पहनना समुदाय की भावनाओं को आहत करता है और इस आधार पर जांच पूरी होने तक एफआईआर रद्द नहीं की जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने पाया कि इस मामले में कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा साबित नहीं हुआ।
Frequently Asked Questions
प्रश्न 1: अदालत ने एफआईआर क्यों रद्द की?
अदालत ने माना कि यह एक रचनात्मक गलती थी और इसमें सिख धर्म को अपमानित करने का कोई जानबूझकर या दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं था।
विवाद इस बात पर था कि एक गैर-अमृतधारी और क्लीन-शेवन अभिनेता को श्री साहिब पहने दिखाया गया था, जो सिख रीति-रिवाजों के अनुसार केवल अमृतधारी सिखों के लिए अनिवार्य है।