सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) को निर्देश दिया है कि वह पैकेज्ड फूड पर फैट, शुगर और सॉल्ट की चेतावनी देने वाले लेबल लागू करने के लिए एक वैज्ञानिक समयसीमा तय करे।

  • सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI को फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग (FoPL) के दूसरे चरण के लिए समयसीमा तय करने का आदेश दिया।
  • कोर्ट ने केवल शब्दों वाले लेबल की आलोचना की और चित्रों (Pictorial) के उपयोग का सुझाव दिया।
  • बच्चों के स्वास्थ्य पर चिंता जताते हुए स्कूली शिक्षा में पोषण संबंधी साक्षरता शामिल करने की बात कही।
  • चेतावनी लोगो के आकार और फॉन्ट साइज को लेकर FSSAI से स्पष्टीकरण मांगा।

जनस्वास्थ्य की सुरक्षा की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) को निर्देश दिया है कि वह फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग (FoPL) के दूसरे चरण को लागू करने के लिए एक "वैज्ञानिक रूप से उचित और स्पष्ट रूप से परिभाषित समयसीमा" निर्धारित करे। यह लेबल उपभोक्ताओं को चेतावनी देगा कि क्या किसी पैकेज्ड फूड आइटम में फैट, शुगर या सॉल्ट (FSS) की मात्रा अधिक है।

जस्टिस जे बी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि यदि ऐसी समयसीमा तय नहीं की गई, तो इस महत्वपूर्ण स्वास्थ्य पहल का कार्यान्वयन पीछे छूट सकता है या अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो सकता है। यह मामला केरल स्थित गैर-लाभकारी संगठन '3S और आवर हेल्थ सोसाइटी' द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई के दौरान आया।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह न्यायिक हस्तक्षेप दर्शाता है कि अब स्वास्थ्य सुरक्षा को उद्योग के हितों से ऊपर रखा जा रहा है। कोर्ट ने FSSAI के उस तर्क को खारिज कर दिया जिसमें 'उद्योग को सुधार के लिए समय देने' की बात कही गई थी। कोर्ट का मानना है कि भारत जैसे विविध साक्षरता वाले देश में केवल शब्दों पर आधारित चेतावनी पर्याप्त नहीं है; चित्रों का उपयोग करना अनिवार्य है ताकि एक कम पढ़ा-लिखा व्यक्ति भी खतरे को समझ सके।

"पैकेजिंग पर चेतावनी संकेतों का सरलीकरण केवल एक नियम नहीं, बल्कि नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार की रक्षा है।"

कोर्ट ने लोगो के फॉन्ट साइज पर भी आपत्ति जताई। याचिकाकर्ता का तर्क था कि वर्तमान प्रस्तावित आकार बहुत छोटा है। सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि चेतावनी लेबल को पैकेज के मुख्य क्षेत्र का 15-20% हिस्सा घेरना चाहिए, जैसा कि कई विकसित देशों में किया जाता है, ताकि उपभोक्ता की नजर उस पर तुरंत पड़े।

अदालत ने विशेष रूप से बच्चों के प्रति चिंता व्यक्त की, जो अस्वस्थ खान-पान की आदतों के "गंभीर जोखिम" में हैं। कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा कि पोषण संबंधी साक्षरता (Nutritional Literacy) को स्कूली शिक्षा में कैसे शामिल किया जाएगा। इसमें पाठ्यक्रम, कार्यशालाओं और छात्रों को लेबल पढ़ने की ट्रेनिंग देने जैसे पहलुओं पर स्पष्टता मांगी गई है।

इसके अलावा, कोर्ट ने डिजिटल खरीदारी के दौर का जिक्र करते हुए कहा कि ई-कॉमर्स के बढ़ते चलन को देखते हुए लेबल के डिजाइन में बदलाव किए जाने चाहिए, ताकि मोबाइल स्क्रीन पर भी ये चेतावनियां स्पष्ट रूप से दिखाई दें।

क्या आप जानते हैं?: लैटिन अमेरिकी देशों में 'ब्लैक ऑक्टागन' (काले अष्टकोण) लेबल का उपयोग किया जाता है, जिससे कई कंपनियों ने अपने उत्पादों में चीनी और नमक की मात्रा कम करने के लिए फॉर्मूला बदला है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: FoPL क्या है?
फ्रंट-ऑफ-पैकेज लेबलिंग (FoPL) एक सरल प्रणाली है जिसके तहत खाद्य पैकेट के सामने ही पोषण संबंधी चेतावनी दी जाती है, ताकि ग्राहक तुरंत निर्णय ले सकें।

प्रश्न 2: FSSAI की दो-चरणीय योजना क्या है?
पहले चरण में केवल मीठे पेय और उन उत्पादों पर लेबल लगेंगे जिनमें कम से कम दो पोषक तत्व (फैट, शुगर, सॉल्ट) अधिक हैं। दूसरे चरण में इसे उन उत्पादों तक बढ़ाया जाएगा जिनमें केवल एक तत्व भी अधिक हो।