तेलंगाना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यौन अपराधों के मामलों में केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर आरोपी का पोटेंसी टेस्ट नहीं कराया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे परीक्षणों के लिए ठोस प्रासंगिकता और आवश्यकता साबित करना अनिवार्य है।

  • पोटेंसी टेस्ट को नियमित या यांत्रिक प्रक्रिया के रूप में नहीं अपनाया जा सकता।
  • अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि टेस्ट जांच में कैसे मदद करेगा।
  • अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी की गोपनीयता और शारीरिक स्वायत्तता का संरक्षण आवश्यक है।

तेलंगाना उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह व्यवस्था दी है कि यौन अपराधों की जांच के दौरान पोटेंसी टेस्ट (नपुंसकता या क्षमता परीक्षण) का आदेश केवल इसलिए नहीं दिया जा सकता क्योंकि आरोप गंभीर हैं। न्यायालय ने एक मजिस्ट्रेट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें बलात्कार के आरोपी की चिकित्सा जांच की अनुमति दी गई थी।

न्यायमूर्ति जे श्रीनिवास राव ने एक आपराधिक याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष यह बताने में विफल रहा कि यह परीक्षण क्यों आवश्यक था, यह जांच में कैसे सहायता करेगा, या इसका जांच किए जा रहे आरोपों से क्या विशिष्ट संबंध है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल आरोपी की क्षमता पर सवाल उठाना ऐसे परीक्षण का आधार नहीं हो सकता।

यह क्यों महत्वपूर्ण है

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह निर्णय आपराधिक न्याय प्रणाली में 'प्रक्रियात्मक औपचारिकता' बनाम 'मौलिक अधिकारों' के बीच एक संतुलन स्थापित करता है। अक्सर जांच एजेंसियां सबूत जुटाने के दबाव में ऐसे परीक्षण करवाती हैं जिनका केस से सीधा संबंध नहीं होता। यह फैसला यह सुनिश्चित करता है कि चिकित्सा परीक्षण केवल तभी किए जाएं जब वे कानूनी रूप से अनिवार्य और प्रासंगिक हों।

"पोटेंसी टेस्ट का यांत्रिक उपयोग आरोपी की व्यक्तिगत गरिमा और निजता के अधिकार का उल्लंघन है, जब तक कि उसकी आवश्यकता कानूनी रूप से सिद्ध न हो।"

मामले की पृष्ठभूमि पर गौर करें तो, जुलाई में एक शिकायत दर्ज की गई थी जिसमें यौन अपराधों के आरोप लगाए गए थे। बाद में, शिकायतकर्ता के बयान के आधार पर बलात्कार की धाराएं जोड़ी गईं। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि डिजिटल पेनिट्रेशन (digital penetration) के मामले में भी क्षमता परीक्षण आवश्यक है ताकि यह निर्धारित किया जा सके कि आरोपी यौन कार्य करने में सक्षम था या नहीं।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने पाया कि डिजिटल पेनिट्रेशन बलात्कार की श्रेणी में आता है, लेकिन इसका सीधा संबंध शारीरिक पोटेंसी टेस्ट से नहीं है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने केवल आरोपों की गंभीरता को देखते हुए अनुमति दे दी थी, जो कि कानूनी रूप से गलत है।

न्यायालय ने जोर देकर कहा कि ऐसे परीक्षणों को संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आरोपी की गोपनीयता, शारीरिक स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के साथ संतुलित किया जाना चाहिए। पोटेंसी परीक्षण यौन अपराध मामलों में कोई अनिवार्य आवश्यकता नहीं है।

क्या आप जानते हैं?: भारतीय कानून के तहत, किसी भी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध चिकित्सा परीक्षण के लिए मजबूर करना उसके मौलिक अधिकारों का हनन माना जा सकता है, यदि वह परीक्षण केस के लिए अप्रासंगिक हो।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. क्या यौन अपराधों में पोटेंसी टेस्ट पूरी तरह प्रतिबंधित है?
नहीं, यह प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन इसे केवल तभी आदेशित किया जा सकता है जब अभियोजन पक्ष इसकी विशिष्ट आवश्यकता और प्रासंगिकता साबित कर दे।

p>2. अनुच्छेद 21 का इस मामले में क्या महत्व है?
अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देता है, जिसमें शारीरिक गरिमा और निजता का अधिकार भी शामिल है।