तिरुपति में नेशनल संस्कृत यूनिवर्सिटी (NSU) द्वारा पुरी की परंपरा के अनुरूप भगवान जगन्नाथ की भव्य रथ यात्रा निकाली गई, जिसमें भक्तों का भारी उत्साह देखा गया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • नेशनल संस्कृत यूनिवर्सिटी (NSU) ने तिरुपति में जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन किया।
  • यह आयोजन विश्वविद्यालय के उत्कल पीठम (ओडिशा चेयर) द्वारा पुरी की परंपरा के आधार पर किया गया।
  • विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों और छात्रों ने इस धार्मिक उत्सव में सक्रिय रूप से भाग लिया।
  • भक्तों ने 'जय जगन्नाथ' के नारों के साथ रथ को खींचकर पुण्य अर्जित किया।

तिरुपति: धार्मिक और सांस्कृतिक एकता का एक अद्भुत दृश्य गुरुवार को तिरुपति में देखने को मिला, जब नेशनल संस्कृत यूनिवर्सिटी (NSU) ने भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की भव्य 'रथ यात्रा' निकाली। यह आयोजन पुरी की विश्व प्रसिद्ध वार्षिक रथ यात्रा की तर्ज पर आयोजित किया गया था, जिसने न केवल विश्वविद्यालय परिसर बल्कि पूरे मंदिर शहर को भक्तिमय कर दिया।

सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक

यह विशेष आयोजन विश्वविद्यालय के उत्कल पीठम (ओडिशा चेयर) द्वारा किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य ओडिशा की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और जगन्नाथ संस्कृति को दक्षिण भारत के आध्यात्मिक केंद्र तिरुपति के साथ जोड़ना था। जैसे ही रथ विश्वविद्यालय परिसर के भीतर स्थित जगन्नाथ मंदिर से निकला, पूरा वातावरण 'जय जगन्नाथ' के जयघोष से गूंज उठा। रथ यात्रा के दौरान शहर की मुख्य सड़कों पर भक्तों का भारी जमावड़ा देखा गया, जहाँ राहगीरों ने भी रुककर भगवान के दर्शन किए और प्रार्थना की।

विश्वविद्यालय नेतृत्व और छात्र भागीदारी

इस भव्य 'शोभा यात्रा' का नेतृत्व विश्वविद्यालय के उच्चाधिकारियों द्वारा किया गया। शैक्षणिक डीन प्रो. रजनीकांत शुक्ला, रजिस्ट्रार कडियम वेंकटनारायणा राव, प्रभारी वित्त अधिकारी प्रो. राधा गोविंद त्रिपाठी, छात्र कल्याण डीन प्रो. एस. दक्षिणामूर्ति शर्मा, ओडिशा चेयर सलाहकार प्रो. जी. शंकरनारायण और निदेशक प्रो. भरत भूषण रथ ने इस यात्रा में अग्रणी भूमिका निभाई।

इस आयोजन की सबसे खास बात छात्रों का समर्पण था। विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों ने न केवल पूरी यात्रा की व्यवस्था संभाली, बल्कि पूरी शोभा यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं को 'प्रसाद' वितरित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह आयोजन शैक्षणिक संस्थानों में सांस्कृतिक मूल्यों और परंपराओं के संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।