दलित संगठनों और कार्यकर्ताओं ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए कर्नाटक विधायिका में रोहित वेमुला विधेयक को तत्काल पारित करने की मांग की है। अप्रैल 2026 में कैबिनेट की मंजूरी के बावजूद, यह विधेयक अभी भी लंबित है।
- कार्यकर्ता वर्तमान मानसून सत्र के दौरान रोहित वेमुला (भेदभाव, बहिष्कार या अन्याय की रोकथाम) विधेयक पारित करने की मांग कर रहे हैं।
- विधेयक को 16 अप्रैल, 2026 को कर्नाटक कैबिनेट ने मंजूरी दी थी, लेकिन यह अभी भी समाज कल्याण विभाग के पास लंबित है।
- इस कानून का उद्देश्य विश्वविद्यालयों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों की शिक्षा और गरिमा के अधिकार की रक्षा करना है।
कर्नाटक सरकार पर रोहित वेमुला (भेदभाव, बहिष्कार या अन्याय की रोकथाम) (शिक्षा और गरिमा का अधिकार) विधेयक, 2026 को लागू करने के लिए दलित संगठनों और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं का भारी दबाव है। यह मांग ऐसे समय में आई है जब राज्य विधायिका का मानसून सत्र चल रहा है, जो शैक्षणिक संस्थानों में जाति-आधारित उत्पीड़न की पुरानी शिकायतों को दूर करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है।
प्रस्तावित कानून हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के पीएचडी स्कॉलर रोहित वेमुला की दुखद आत्महत्या के संदर्भ में तैयार किया गया है, जिसकी मृत्यु ने "संस्थागत हत्या" के खिलाफ देशव्यापी आक्रोश पैदा कर दिया था। यह विधेयक एक ऐसा कानूनी ढांचा तैयार करने के लिए है जो उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों, शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों की गरिमा और शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करे।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
रोहित अधिनियम की मांग लगभग एक दशक पहले शुरू हुई थी, जब यह महसूस किया गया कि मौजूदा दिशा-निर्देश प्रणालीगत भेदभाव को रोकने के लिए अपर्याप्त थे। हालांकि 1989 का एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम व्यापक सुरक्षा प्रदान करता है, लेकिन कार्यकर्ताओं का तर्क है कि विश्वविद्यालयों को एक विशिष्ट नागरिक व्याख्या की आवश्यकता है ताकि हाशिए पर रहने वाले छात्रों द्वारा सामना किए जाने वाले सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक और प्रशासनिक बहिष्कार से निपटा जा सके। इस मुद्दे को तब नई गति मिली जब राहुल गांधी और कर्नाटक मंत्री प्रियंक खड़गे ने सार्वजनिक रूप से इस कानून का समर्थन किया।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण से पता चलता है कि इस विधेयक को पारित करने में देरी केवल प्रशासनिक नहीं बल्कि प्रतीकात्मक है। कैबिनेट द्वारा पहले ही अनुमोदित विधेयक को लटकाकर, सरकार छात्रों और कार्यकर्ताओं के एक महत्वपूर्ण वर्ग को नाराज करने का जोखिम उठा रही है। रोहित अधिनियम का उद्देश्य यूजीसी (UGC) इक्विटी रेगुलेशन की कमियों को भरना है, जिनमें विश्वविद्यालय प्रशासन को बहिष्कारी प्रथाओं के लिए जवाबदेह ठहराने की कानूनी शक्ति नहीं है।
रोहित अधिनियम को एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की एक नागरिक व्याख्या के रूप में देखा गया है, जो विशेष रूप से उच्च शिक्षण संस्थानों में दलित और आदिवासी छात्रों द्वारा सामना किए जाने वाले भेदभाव पर केंद्रित है।
जुलाई 2024 में गठित 'कैंपेन फॉर रोहित एक्ट' ने कानूनी विशेषज्ञों और छात्र समूहों के साथ व्यापक परामर्श के बाद इस मसौदे को तैयार किया था। इसके बावजूद, इसे दिसंबर 2025 के शीतकालीन सत्र या मार्च 2026 के बजट सत्र में पेश नहीं किया गया, जिससे सरकार की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं।
| विशेषता | यूजीसी इक्विटी रेगुलेशन | प्रस्तावित रोहित अधिनियम |
|---|---|---|
| कानूनी स्थिति | प्रशासनिक दिशा-निर्देश | विधायी कानून (Statute) |
| दायरा | कई श्रेणियों के लिए व्यापक | विशिष्ट एससी/एसटी सुरक्षा |
| प्रवर्तन | आंतरिक विश्वविद्यालय समीक्षा | कानूनी/न्यायिक उपचार |
दलित संघर्ष समिति के संयोजक मावल्ली शंकर ने मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार से इस सत्र में विधेयक पारित कराने का आग्रह किया है, और चेतावनी दी है कि यदि ऐसा नहीं हुआ तो छात्रों का आक्रोश सड़कों पर उतर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: रोहित वेमुला विधेयक का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस विधेयक का उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी/एसटी छात्रों और कर्मचारियों के लिए जाति-आधारित भेदभाव और बहिष्कार को रोककर उनकी शिक्षा और गरिमा के अधिकार की रक्षा करना है।
प्रश्न 2: इस विधेयक को 1989 के एससी/एसटी अधिनियम की नकल क्यों नहीं माना जाता?
1989 के व्यापक अधिनियम के विपरीत, रोहित अधिनियम विशेष रूप से विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के अद्वितीय संस्थागत वातावरण पर केंद्रित एक विशिष्ट नागरिक कानून है।