राजस्व अनुदान के रूप में 1.62 करोड़ रुपये छह बेकार हॉस्टलों को वितरित किए गए, यह तथ्य राज्य के CAG ऑडिट ने उजागर किया। जालना, बुलढाणा और लातूर में स्थित इन संस्थानों ने छात्र‑वर्ग को कोई सुविधा नहीं दी, फिर भी सरकारी फंड जारी किया गया।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • महाराष्ट्र में 6 गैर-कार्यशील हॉस्टलों को 1.62 करोड़ रुपये अनुदान मिला
  • CAG ने 2024‑25 के ऑडिट में व्यापक अव्यवस्थाएँ उजागर कीं
  • अपूर्ण बायोमैट्रिक और बुनियादी सुविधाओं की कमी से छात्र प्रभावित

राज्य के नियंत्रण और लेखा परीक्षक (CAG) ने हाल ही में एक विस्तृत ऑडिट प्रस्तुत किया, जिसमें छह "भूतिया" हॉस्टलों को चार साल में 1.62 करोड़ रुपये की अनजाने फंडिंग मिली, जबकि ये संस्थान पूरी तरह से निष्क्रिय थे। जालना जिले में चार, बुलढाणा में एक और लातूर में एक ऐसे ही निलंबित हॉस्टलों की सूची मिलती है, जिनके बारे में आधिकारिक दस्तावेज़ों में छात्र‑आवास का दावा किया गया, परंतु वास्तविकता में कोई छात्र नहीं रहा।

ऑडिट की प्रमुख खोजें

ऑडिट रिपोर्ट में मोदीखान हॉस्टल, जालना का उल्लेख है, जहाँ रिकॉर्ड में 38 छात्रों के रहने की बात थी, परंतु निरीक्षकों ने एक जर्जर, बंद इमारत देखी। फिर भी, राज्य ने चार साल में इस काल्पनिक संस्थान को 18 लाख रुपये का मानदेय जारी किया। इसी तरह, जाफराबाद में 24 छात्रों के लिए निर्धारित एक अन्य हॉस्टल पूरी तरह से अनछुआ, धूल‑भरा था।

व्यापक प्रणालीगत त्रुटियां

सिर्फ इन "भूतियों" तक सीमित नहीं, CAG ने 39 सरकारी एवं सहायता प्राप्त हॉस्टलों का भौतिक निरीक्षण किया, जहाँ बुनियादी सुविधाओं की कमी स्पष्ट हुई। कई कार्यशील हॉस्टलों में रसोई, पुस्तकालय, कंप्यूटर लैब और बिजली बैकअप जैसी आवश्यकताओं की अनुपस्थिति दर्ज की गई। सुरक्षा और स्वच्छता के मानकों की भी गंभीर लापरवाही देखी गई, विशेषकर नलगौर और जालना जैसे जिलों में दिव्यांग छात्रों को ऊपरी मंजिलों में रहने के लिए मजबूर किया गया।

प्रौद्योगिकी एवं निगरानी की खामियां

राज्य ने बायोमैट्रिक प्रणाली में निवेश किया, परंतु 280 में से केवल 46 हॉस्टलों में ही ये उपकरण कार्यरत पाए गए। यह अकार्यक्षमता न केवल फंड के दुरुपयोग को बढ़ावा देती है, बल्कि छात्रों की पहचान एवं सुरक्षा में भी खामियां पैदा करती है।

बिना खर्च किए गए बड़े रकम

सामाजिक न्याय एवं विशेष सहायता विभाग के बजट में 2023‑24 में 487 करोड़ रुपये निर्धारित थे, परंतु 56.65 करोड़ रुपये अभी भी बिन‍ा खर्च के रह गए। यह आंकड़ा राज्य की वित्तीय अनुशासनहीनता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है, जबकि 2,300 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जा रहे थे।

कुल मिलाकर, यह ऑडिट न केवल धन की हानि को उजागर करता है, बल्कि राज्य की शैक्षिक बुनियादी ढांचा, निगरानी तंत्र और छात्र‑कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता पर गंभीर प्रश्न उठाता है। भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने हेतु पारदर्शी निगरानी, सख्त ऑडिट और वास्तविक कार्यान्वयन की आवश्यकता स्पष्ट है।