भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों (IISERs) में नेतृत्व और शासन की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के बजाय प्रशासनिक और अन्य क्षेत्रों के लोगों की नियुक्ति से संस्थानों की स्वायत्तता और शोध दृष्टि प्रभावित हो रही है।

  • IISER बोर्डों में वैज्ञानिक पृष्ठभूमि वाले नेतृत्व की भारी कमी देखी जा रही है।
  • कई संस्थानों के अध्यक्षों के पास अन्य संस्थानों का भी अतिरिक्त प्रभार है, जिससे ध्यान बँटा हुआ है।
  • प्रशासनिक नियुक्तियों के कारण संस्थानों की शोध स्वायत्तता और भविष्य की दृष्टि पर संकट मंडरा रहा है।

भारत सरकार ने भारतीय विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थानों (IISERs) की स्थापना एक ऐसा बौद्धिक वातावरण प्रदान करने के लिए की थी, जहाँ छात्र अपने करियर के शुरुआती चरणों में ही उच्च स्तरीय शोध से जुड़ सकें। इन संस्थानों का मूल उद्देश्य बुनियादी विज्ञान (Basic Science) में नवाचार लाना है। हालांकि, हालिया रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि इन संस्थानों के नेतृत्व और शासन ढांचे में एक गहरा संकट उभर रहा है।

IISER अधिनियम 2007 के तहत, प्रत्येक संस्थान के पास एक 'बोर्ड ऑफ गवर्नर्स' होता है। इस बोर्ड में वरिष्ठ सरकारी अधिकारी और नामित सदस्य शामिल होते हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है जब इन बोर्डों में नेतृत्व की भूमिकाएँ केवल प्रशासनिक पदों तक सीमित हो जाती हैं, जिससे वैज्ञानिक दृष्टि का अभाव हो जाता है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि जब किसी वैज्ञानिक संस्थान का नेतृत्व उन लोगों के हाथों में होता है जिनका वैज्ञानिक अनुसंधान से सीधा संबंध नहीं है, तो संस्थान की दीर्घकालिक शोध क्षमता और वैश्विक विश्वसनीयता दांव पर लग जाती है। यह केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं है, बल्कि भारत के वैज्ञानिक भविष्य का प्रश्न है।

वर्तमान में, सात IISER बोर्डों की संरचना का विश्लेषण करने पर चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। कई अध्यक्ष एक साथ कई संस्थानों के बोर्ड का नेतृत्व कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, IISER तिरुवनंतपुरम के अध्यक्ष के पास IIIT कोट्टायम और IIIT दुरंड (Kurnool) का भी प्रभार है। इस तरह के 'मल्टीपल रोल' के कारण संस्थानों के पास समर्पित नेतृत्व की कमी हो जाती है।

वैज्ञानिक संस्थानों को चलाने के लिए केवल प्रशासनिक कुशलता पर्याप्त नहीं है; इसके लिए वैज्ञानिक दृष्टि और शोध की गहरी समझ अनिवार्य है।

नेतृत्व की योग्यता पर भी सवाल उठ रहे हैं। IISER पुणे के अध्यक्ष एक सेवानिवृत्त IAS अधिकारी हैं जिनका अनुभव वाणिज्य और पत्रकारिता में है, जबकि IISER तिरुपति के अध्यक्ष एक उद्योगपति हैं। हालांकि प्रशासन और वित्त में विशेषज्ञों की आवश्यकता है, लेकिन बुनियादी विज्ञान के इन केंद्रों का नेतृत्व उन वैज्ञानिकों के पास होना चाहिए जिन्होंने स्वयं अनुसंधान की चुनौतियों को समझा हो।

इतिहास गवाह है कि पहले सरकार इन संस्थानों के शीर्ष पर देश के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिकों को नियुक्त करती थी। लेकिन वर्तमान प्रवृत्ति में, अनुभवी वैज्ञानिकों के बजाय प्रशासनिक अधिकारियों को प्राथमिकता दी जा रही है। इससे संस्थानों की स्वायत्तता कमजोर हो रही है और वैज्ञानिक निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सरकारी नियंत्रण बढ़ रहा है।

Did You Know?: IISER की स्थापना का मुख्य उद्देश्य भारत में शोध संस्कृति को छात्र जीवन के शुरुआती स्तर से ही विकसित करना था।

Frequently Asked Questions

1. क्या IISER के अध्यक्ष के लिए वैज्ञानिक होना अनिवार्य है?
कानूनी रूप से कोई ऐसा नियम नहीं है, लेकिन संस्थान की वैज्ञानिक दृष्टि और विश्वसनीयता के लिए वैज्ञानिक नेतृत्व को बेहतर माना जाता है।

2. नेतृत्व की कमी से छात्रों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
कमजोर नेतृत्व से शोध के संसाधनों का गलत आवंटन हो सकता है और संस्थान की शैक्षणिक गुणवत्ता गिर सकती है।