कलिकूट विश्वविद्यालय ने अपने 445 संबद्ध कॉलेजों में छात्र यूनियन चुनावों के नियमों को अपडेट करने के लिए एक पाँच सदस्यीय समिति बनाई है। यह पहल दो दशकों पुरानी जे.एम. लिंघो समिति की सिफ़ारिशों के अनुरूप है और इस साल के सितंबर‑अक्टूबर में होने वाले चुनावों में लागू की जाएगी।
- पांच सदस्यीय समिति ने चुनाव सुधारों के सुझाव तैयार किए हैं।
- नियमों में लोकतांत्रिक प्रशिक्षण, शोध छात्र संघ और चुनावी स्वरूप की लचीलापन शामिल होगा।
- छात्र संगठनों ने प्रस्ताव पर मिश्रित प्रतिक्रिया व्यक्त की है।
कलिकूट विश्वविद्यालय (CU) ने अपने 445 संबद्ध कॉलेजों और मुख्य परिसर, टेनिपालम, में छात्र यूनियन चुनावों के नियमों को पुनः व्यवस्थित करने की योजना बनाई है। यह कदम दो दशकों पहले केंद्र सरकार द्वारा स्थापित जे.एम. लिंघो समिति की सिफ़ारिशों के अनुरूप है, जिसने देश भर के विश्वविद्यालयों में छात्र यूनियन मतदान की प्रक्रिया का अध्ययन किया था।
विश्वविद्यालय के उपकुलपति पी. रविंद्रन ने हाल ही में एक पाँच सदस्यीय समिति का गठन किया, जिसका उद्देश्य मौजूदा नियमों की व्यापक समीक्षा करना और नई सिफ़ारिशें प्रस्तुत करना है। इस समिति के चेयरपर्सन हैं एन. मोहम्मदाली, कॉलेज विकास परिषद के निदेशक, और इसका समन्वयक हैं के. फज़लुरहमान, छात्र कल्याण के डीन। अन्य सदस्य हैं ए.एम. विनोद कुमार, प्रीती कुट्टिपुलक्कल और प्रमोद कोव्वापुरथ।
पिछले 25 वर्षों में चुनाव नियमों में कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ, और हालिया चुनावों में हिंसा और कानूनी विवादों की आवृत्ति बढ़ी है। विश्वविद्यालय ने कहा कि यह सुधार प्रक्रिया इस साल के सितंबर‑अक्टूबर में आयोजित होने वाले चुनावों से पहले लागू की जाएगी।
नए नियमों में छात्रों को लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का प्रशिक्षण देना, शोध छात्रों और स्नातक छात्रों के लिए अलग-अलग यूनियन बनाना, और संस्थानों को संसद‑आधारित या राष्ट्रपति‑आधारित चुनावी स्वरूप चुनने की स्वतंत्रता देना शामिल है। संसद‑आधारित मॉडल के लिए चुनावी निधि और छात्र परिषद की कड़ी निगरानी की सिफ़ारिश भी की गई है।
छात्र संगठनों की प्रतिक्रियाएँ मिश्रित हैं। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) ने इस कदम को मुख्य परिसर के डिपार्टमेंटल स्टूडेंट्स यूनियन (DSU) में शक्ति हासिल करने की कोशिश के रूप में देखा, जबकि मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन (MSF) के राज्य उपाध्यक्ष शरफ़ुदीन पिलक्कल ने कहा कि मौजूदा चुनावी बायलॉज़ को तत्काल सुधार की जरूरत है। केरल स्टूडेंट्स यूनियन (KSU) के राज्य महासचिव सानोज़ कुरुवट्टूर ने पारदर्शी चुनाव प्रक्रियाओं की मांग की।
Why This Matters
BozokMedia analysis shows that the revamp could set a precedent for other South Indian universities grappling with election‑related violence and legal challenges, potentially reshaping campus democracy across the region.
"यदि विश्वविद्यालय चुनावों में पारदर्शिता और प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी जाए तो छात्र सहभागिता में उल्लेखनीय सुधार होगा," मानते हैं लोकतंत्र विशेषज्ञ डॉ. अंजली मेहरा।
Frequently Asked Questions
Q1: क्या शोध छात्र अब अलग यूनियन में भाग ले पाएंगे?
A: प्रस्तावित नियमों के अनुसार, शोध छात्रों के लिए एक अलग यूनियन बनाने की संभावना है, जिससे उनकी विशिष्ट शैक्षणिक जरूरतों को बेहतर तरीके से प्रतिनिधित्व किया जा सके।
Q2: विश्वविद्यालय कौन सा चुनावी स्वरूप अपनाएगा?
A: प्रत्येक कॉलेज को अपनी पसंद के अनुसार संसद‑आधारित या राष्ट्रपति‑आधारित स्वरूप चुनने की आज़ादी होगी, बशर्ते वह नई निगरानी मानकों का पालन करे।