मैसूर स्थित केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL) भाषाविज्ञान पर 75 परिचयात्मक पुस्तकें प्रकाशित करने जा रहा है, जिसमें भारतीय भाषाओं और उनके व्याकरणिक दृष्टिकोणों को प्राथमिकता दी जाएगी।
- CIIL भाषाविज्ञान पर भारतीय दृष्टिकोण को शामिल करते हुए 75 परिचयात्मक पुस्तकें प्रकाशित करेगा।
- 15 खंड विशेष रूप से भारतीय व्याकरणिक परंपराओं पर केंद्रित होंगे।
- संस्थान ने स्पष्ट किया कि व्याकरणिक परंपराएं केवल संस्कृत तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसमें द्रविड़ और अन्य क्षेत्रीय भाषाएं भी शामिल हैं।
मैसूर स्थित केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL) के निदेशक बसवराज कोडगुंटी ने सोमवार को एक महत्वाकांक्षी पहल की घोषणा की। इसके तहत संस्थान भाषाविज्ञान में लगभग 75 परिचयात्मक पुस्तकें तैयार करेगा, जिनमें भारतीय भाषाओं और उनके अद्वितीय दृष्टिकोणों का व्यापक प्रतिनिधित्व होगा।
भारतीय व्याकरणिक परंपराओं पर आयोजित दो सप्ताह के ओरिएंटेशन प्रोग्राम के उद्घाटन के अवसर पर प्रो. कोडगुंटी ने बताया कि इनमें से लगभग 15 खंड विशेष रूप से भारतीय व्याकरणिक परंपराओं पर केंद्रित होंगे। अन्य पुस्तकें ध्वनि विज्ञान (Phonology), रूप विज्ञान (Morphology), वाक्य विन्यास (Syntax) और अर्थ विज्ञान (Semantics) जैसे क्षेत्रों में भारतीय परिप्रेक्ष्य को शामिल करेंगी।
यह क्यों महत्वपूर्ण है
BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह कदम भाषाविज्ञान के अध्ययन को पश्चिमी ढांचे से मुक्त कर भारतीय जड़ों से जोड़ने का एक प्रयास है। क्षेत्रीय व्याकरणिक परंपराओं को संस्थागत मान्यता देकर, CIIL यह सुनिश्चित कर रहा है कि भारत की बौद्धिक विरासत को आधुनिक शोध में उचित स्थान मिले।
प्रो. कोडगुंटी ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय व्याकरणिक परंपराओं को केवल संस्कृत तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्होंने स्पष्ट किया कि कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम, पाली और प्राकृत जैसी भाषाओं की अपनी समृद्ध परंपराएं और व्याकरणिक विश्लेषण का इतिहास रहा है।
विभिन्न भाषाई परंपराओं के बीच का संवाद भारत के बौद्धिक इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है।
निदेशक ने युवा पीढ़ी, विशेष रूप से शिक्षकों और शोधकर्ताओं से आह्वान किया कि वे इन अध्ययनों को आगे बढ़ाएं और उन्हें अपने शैक्षणिक कार्यों में एकीकृत करें ताकि यह ज्ञान आने वाली पीढ़ियों तक पहुंच सके।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
प्रश्न 1: CIIL की इस नई प्रकाशन पहल का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य भाषाविज्ञान के अध्ययन में भारतीय दृष्टिकोणों को शामिल करना और इसे केवल संस्कृत तक सीमित न रखकर अन्य क्षेत्रीय भाषाओं तक विस्तारित करना है।
प्रश्न 2: संस्कृत के अलावा किन भाषाओं का उल्लेख किया गया है?
इस पहल में तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, पाली और प्राकृत जैसी भाषाओं के व्याकरणिक महत्व को रेखांकित किया गया है।