मैसूरु स्थित भारतीय भाषा संस्थान (CIIL) में भारत की समृद्ध व्याकरणिक विरासत को पुनर्जीवित करने के लिए एक दो-सप्ताह का गहन कार्यक्रम शुरू हुआ है, जिसमें देश भर के शोधकर्ता और विशेषज्ञ हिस्सा ले रहे हैं।

  • CIIL मैसूरु में 'भारतीय व्याकरण परंपरा' पर दो सप्ताह का अभिविन्यास कार्यक्रम शुरू।
  • पाणिनी और पतंजलि के भाषाई सिद्धांतों के साथ-साथ पाली, प्राकृत और तमिल व्याकरण पर चर्चा।
  • देश भर से 900 आवेदनों में से चयनित 163 विशेषज्ञ और शोधकर्ता ले रहे हैं हिस्सा।

मैसूरु स्थित केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL) ने सोमवार से 'भारतीय व्याकरण परंपरा' पर एक विशेष दो-सप्ताह के अभिविन्यास कार्यक्रम का आगाज़ किया। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य भारत की प्राचीन और समृद्ध व्याकरणिक विरासत की गहरी समझ विकसित करना और समकालीन भाषा विज्ञान में इसकी प्रासंगिकता को खोजना है। यह कार्यक्रम 31 अगस्त से 14 सितंबर तक चलेगा, जिसमें विभिन्न भाषाई और शैक्षणिक पृष्ठभूमि के विद्वान शामिल हो रहे हैं।

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में पुणे के डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट के कुलपति प्रो. प्रसाद जोशी मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित थे, जबकि पुणे विश्वविद्यालय की संस्कृत और प्राकृत भाषाओं की पूर्व प्रोफेसर सरोजा भाते विशेष अतिथि थीं। संस्थान के निदेशक बसवराजा कोडगुंटी ने बताया कि इस कार्यक्रम के प्रति जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है, जिसमें भारत और पड़ोसी देशों से लगभग 900 आवेदन प्राप्त हुए थे।

भारतीय व्याकरण का वैज्ञानिक आधार

अपने संबोधन में प्रो. जोशी ने भारतीय व्याकरणिक विद्वता को भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन में एक मील का पत्थर बताया। उन्होंने पाणिनी और पतंजलि का उल्लेख करते हुए समझाया कि कैसे भारतीय परंपरा ने नियमों और उनके अनुप्रयोग के माध्यम से भाषा के विश्लेषण के व्यवस्थित तरीके विकसित किए। उन्होंने विशेष रूप से पाणिनी की 'अष्टाध्यायी' का उदाहरण दिया, जो यह दर्शाता है कि नियमों का एक सुव्यवस्थित समूह भाषाई अभिव्यक्तियों की विशाल श्रृंखला की व्याख्या कैसे कर सकता है।

भारतीय व्याकरण केवल संस्कृत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पाली, प्राकृत, तमिल और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के बौद्धिक विकास का एक एकीकृत संगम है।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण के अनुसार, यह पहल केवल अकादमिक नहीं है, बल्कि डिजिटल युग में भाषाओं के संरक्षण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब दुनिया नेचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (NLP) और AI की ओर बढ़ रही है, तो पाणिनी जैसे व्याकरणियों के तर्क-आधारित नियम कंप्यूटर एल्गोरिदम के लिए एक मजबूत आधार प्रदान कर सकते हैं। यह कार्यक्रम क्षेत्रीय भाषाओं और शास्त्रीय भाषाओं के बीच की खाई को पाटने का काम कर रहा है।

प्रो. सरोजा भाते ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय व्याकरणिक छात्रवृत्ति ने न केवल भाषा बल्कि व्यापक बौद्धिक परंपराओं को भी प्रभावित किया है। उन्होंने बताया कि कैसे पश्चिमी विद्वानों ने भी संस्कृत और ध्वनिकी (phonetics) के अध्ययन में भारत के योगदान को स्वीकार किया है। उन्होंने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे व्याकरण को केवल एक संकीर्ण विषय के रूप में न देखें, बल्कि इसे संस्कृति, संचार और बौद्धिक विकास के साथ जोड़कर समझें।

इस दो-सप्ताह के गहन पाठ्यक्रम में कुल 56 शैक्षणिक सत्र निर्धारित हैं, जिनका नेतृत्व आईआईटी (IITs), आईआईआईटी (IIITs) और विभिन्न केंद्रीय व राज्य विश्वविद्यालयों के 22 विशेषज्ञ करेंगे। इसमें शामिल 163 पंजीकृत प्रतिभागी भारत के विभिन्न हिस्सों से आए हैं, जो तमिल और कन्नड़ से लेकर उत्तर-पूर्वी भारत की भाषाओं तक का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं।

क्या आप जानते हैं?: पाणिनी की अष्टाध्यायी को दुनिया के सबसे पुराने और सबसे सटीक व्याकरणिक ग्रंथों में से एक माना जाता है, जिसकी संरचना आधुनिक कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषाओं के समान तर्कसंगत है।

Frequently Asked Questions

1. इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य भारतीय व्याकरणिक परंपराओं (संस्कृत, पाली, प्राकृत, तमिल आदि) के प्रति शोधकर्ताओं और शिक्षकों में गहरी समझ पैदा करना और आधुनिक भाषा अध्ययन में उनके उपयोग को खोजना है।

2. इस कार्यक्रम में कौन-कौन शामिल हो रहा है?
इसमें देश भर के विश्वविद्यालयों, IITs, IIITs और भाषा अनुसंधान संस्थानों के 163 चयनित विद्वान और शोधकर्ता भाग ले रहे हैं।