UPSC सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए GS पेपर 2 के महत्वपूर्ण प्रश्नों का विश्लेषण। इसमें भारत की रणनीतिक स्वायत्तता और सिंधु जल संधि पर केंद्रित गहन चर्चा की गई है।

  • SCO में भारत की भागीदारी 'एंटी-वेस्टर्न' नहीं बल्कि 'रणनीतिक स्वायत्तता' का प्रतीक है।
  • ईरान की सदस्यता के साथ SCO में भारत की कनेक्टिविटी और मध्य एशिया तक पहुंच का महत्व बढ़ा है।
  • सिंधु जल संधि (IWT) वर्तमान भू-राजनीतिक तनावों के बीच स्थिरता के लिए एक महत्वपूर्ण लेकिन चुनौतीपूर्ण उपकरण है।

UPSC सिविल सेवा मुख्य परीक्षा 2027 की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए आज का अभ्यास सत्र विशेष रूप से GS पेपर 2 के महत्वपूर्ण विषयों पर केंद्रित है। इस सप्ताह के अभ्यास में भारत के बहुपक्षीय संबंधों, विशेष रूप से शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और सिंधु जल संधि (IWT) के जटिल पहलुओं को शामिल किया गया है।

SCO: रणनीतिक स्वायत्तता का एक मंच

भारत की SCO के साथ बढ़ती सक्रियता को अक्सर पश्चिमी देशों के विरोध के रूप में देखा जाता है, लेकिन BozokMedia विश्लेषण दिखाता है कि यह वास्तव में भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। भारत एक तरफ रूस और ईरान जैसे देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ चीन और पाकिस्तान के साथ अपने द्विपक्षीय मतभेदों को भी प्रबंधित कर रहा है।

SCO में ईरान का शामिल होना भारत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। ईरान की भौगोलिक स्थिति भारत को मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए एक महत्वपूर्ण द्वार प्रदान करती है। यद्यपि प्रतिबंधों और अन्य बाधाओं के कारण चुनौतियां मौजूद हैं, लेकिन SCO भारत को एक ऐसा मंच देता है जहाँ वह अपनी कनेक्टिविटी संबंधी महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर सके।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

वर्तमान वैश्विक शक्ति समीकरणों के बीच, भारत अपनी विदेश नीति में किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रख रहा है। SCO के माध्यम से भारत यूरेशियाई क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, जो कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र के साथ-साथ भारत की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए आवश्यक है।

भारत का SCO में शामिल होना किसी गुटबाजी का हिस्सा नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति में अपने स्वतंत्र स्थान को सुरक्षित करने की एक सोची-समझी रणनीति है।

सिंधु जल संधि और भू-राजनीतिक तनाव

दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) की प्रासंगिकता पर केंद्रित है। दशकों से भारत और पाकिस्तान के बीच तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद, यह संधि सहयोग का एक दुर्लभ उदाहरण रही है। हालांकि, वर्तमान भू-राजनीतिक संदर्भ में, आतंकवाद और सीमा पार सुरक्षा चुनौतियों ने इस संधि के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

Did You Know?: सिंधु जल संधि 1960 में हुई थी और इसे विश्व बैंक के माध्यम से लागू किया गया था, जो इसे दुनिया की सबसे सफल जल संधियों में से एक बनाती है।

निष्कर्ष

निष्कर्षतः, भारत की विदेश नीति बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है। चाहे वह SCO के माध्यम से यूरेशिया में प्रभाव बढ़ाना हो या सिंधु जल संधि के माध्यम से अपने जल संसाधनों की सुरक्षा करना, भारत का दृष्टिकोण हमेशा अपने संप्रभु हितों और रणनीतिक स्वायत्तता के इर्द-गिर्द घूमता है।

Frequently Asked Questions

1. क्या भारत SCO के माध्यम से पश्चिम का विरोध कर रहा है?
नहीं, भारत की भागीदारी उसके राष्ट्रीय हितों और रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखने के लिए है, न कि किसी विशेष ब्लॉक के खिलाफ होने के लिए।

2. सिंधु जल संधि के लिए मुख्य चुनौतियां क्या हैं?
मुख्य चुनौतियों में भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते राजनीतिक तनाव, आतंकवाद और जल सुरक्षा की बढ़ती आवश्यकताएं शामिल हैं।