उद्यमी अश्विनी ग्रोवर ने दावा किया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय को विश्व स्तरीय बनाने के लिए 20,000 करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता है। उन्होंने कैंपस की बदहाली को छात्रों के विदेश जाने का एक मुख्य कारण बताया है।

  • अश्विनी ग्रोवर ने DU को वर्ल्ड-क्लास बनाने के लिए ₹20,000 करोड़ ($2 बिलियन) के निवेश का सुझाव दिया।
  • 90 से अधिक कॉलेजों में से केवल 19 में हॉस्टल सुविधा उपलब्ध है, जो एक गंभीर संकट है।
  • साउथ कैंपस में हवाई अड्डे की निकटता और नियामक प्रतिबंधों के कारण निर्माण कार्य कठिन है।
  • बुनियादी ढांचे की कमी को प्रतिभाशाली भारतीय छात्रों के विदेश पलायन का एक प्रमुख कारण माना जा रहा है।

भारत के उच्च शिक्षा बुनियादी ढांचे पर बहस तब तेज हो गई जब सत्य निकेतन में एक पीजी इमारत ढह गई। इस मुद्दे पर अब कॉर्पोरेट जगत से अश्विनी ग्रोवर (भारतपे के सह-संस्थापक और पूर्व शार्क टैंक इंडिया जज) ने अपनी राय साझा की है। उन्होंने तर्क दिया है कि दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) को एक विश्व स्तरीय संस्थान बनाने के लिए भारी निवेश की आवश्यकता है।

X (पूर्व में ट्विटर) पर लिखते हुए ग्रोवर ने कहा, "DU को वर्ल्ड क्लास बनाने के लिए कम से कम $2 बिलियन (20,000 करोड़) के निवेश की जरूरत है।" उनकी यह प्रतिक्रिया एक अन्य उपयोगकर्ता के दावे पर आई, जिसमें कहा गया था कि 2014 के बाद से DU में कोई नया हॉस्टल नहीं बना है, जबकि उसी अवधि में कई राजनीतिक कार्यालय बनाए गए।

आवास का गंभीर संकट

DU की आवासीय क्षमता के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। 90 से अधिक कॉलेजों में से केवल 19 कॉलेजों में हॉस्टल की सुविधा है। इनमें से हिंदू कॉलेज की क्षमता सबसे अधिक है, जो लगभग 560 बेड है। यह संख्या उन हजारों छात्रों के मुकाबले नगण्य है जो हर साल CUET-UG के माध्यम से देश के कोने-कोने से दिल्ली आते हैं।

यह क्यों महत्वपूर्ण है?

BozokMedia के विश्लेषण के अनुसार, यह केवल ईंट-पत्थर का मामला नहीं है, बल्कि वैश्विक प्रतिस्पर्धा का सवाल है। जब आर्थिक रूप से कमजोर छात्र DU में प्रवेश पाते हैं, तो किफायती आवास की कमी उन्हें असुरक्षित पीजी में रहने को मजबूर करती है, जैसा कि सत्य निकेतन की घटना में देखा गया। यदि भारत का शीर्ष सार्वजनिक विश्वविद्यालय बुनियादी सुविधाएं नहीं दे सकता, तो छात्रों का विदेशी विश्वविद्यालयों की ओर रुख करना स्वाभाविक है।

"शैक्षणिक प्रतिष्ठा और भौतिक बुनियादी ढांचे के बीच की खाई ही घरेलू प्रतिभाओं को भारत में रुकने से रोकने वाला सबसे बड़ा कारक है।"

नियामक और लॉजिस्टिक बाधाएं

समस्या केवल धन की नहीं है। श्री वेंकटेश्वर कॉलेज के प्रिंसिपल प्रोफेसर वजला रवि ने बताया कि साउथ कैंपस के कॉलेजों में निर्माण कार्य अत्यंत कठिन है। उन्होंने कहा कि एक कमरा बनाने के लिए भी 'युद्ध स्तर' के प्रयासों की आवश्यकता होती है, क्योंकि हवाई अड्डे की निकटता और स्थानीय नियमों के कारण ऊंची इमारतें बनाना प्रतिबंधित है।

विशेषता DU की वर्तमान स्थिति विश्व स्तरीय मानक
हॉस्टल उपलब्धता ~21% कॉलेज पूर्ण ऑन-कैंपस आवास
बुनियादी ढांचे की आयु दशकों पुरानी / जर्जर स्मार्ट कैंपस / आधुनिक तकनीक
विस्तार क्षमता कड़े नियामक प्रतिबंध नियोजित शैक्षणिक क्षेत्र

जैसे-जैसे उच्च शिक्षा का परिदृश्य बदल रहा है और निजी विश्वविद्यालय आधुनिक कैंपस में निवेश कर रहे हैं, DU की सरकारी आवंटन पर निर्भरता एक कमजोरी बनती जा रही है। कैंपस की सुविधाओं और विदेश जाने वाले छात्रों की बढ़ती संख्या के बीच एक सीधा संबंध दिखाई देता है।

क्या आप जानते हैं?: DU की कई प्रतिष्ठित लाल ईंटों वाली इमारतें औपनिवेशिक काल की हैं, जो उन्हें ऐतिहासिक तो बनाती हैं लेकिन आधुनिक तकनीक के कार्यान्वयन में बाधा डालती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: DU के साउथ कैंपस में नए हॉस्टल बनाना क्यों कठिन है?
निर्माण कार्य दिल्ली हवाई अड्डे की निकटता के कारण ऊंचाई प्रतिबंधों और कड़े नियामक नियमों से बाधित है।

प्रश्न 2: DU के बुनियादी ढांचे और छात्रों के विदेश जाने के बीच क्या संबंध है?
छात्र केवल पाठ्यक्रम के लिए नहीं, बल्कि बेहतर आवास, आधुनिक लैब और उच्च जीवन स्तर के लिए विदेशी विश्वविद्यालयों को चुनते हैं।