तमिलनाडु के कॉलेज और विश्वविद्यालय शिक्षकों ने नए संशोधन विधेयक का विरोध करते हुए इसे शिक्षा के व्यवसायीकरण की ओर एक बड़ा कदम बताया है। उनका तर्क है कि इससे सरकारी शिक्षा प्रणाली कमजोर होगी।

  • निजी विश्वविद्यालयों के लिए भूमि की आवश्यकता को आधा कर दिया गया है।
  • स्थायी बंदोबस्ती निधि (Endowment Fund) को 50 करोड़ से घटाकर 25 करोड़ रुपये किया गया है।
  • शिक्षकों का आरोप है कि सरकारी विश्वविद्यालयों में फंड और नियुक्तियों की भारी कमी है।

चेन्नई में शिक्षा जगत के भीतर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। तमिलनाडु विधानसभा द्वारा मंगलवार (8 सितंबर, 2026) को पारित तमिलनाडु निजी विश्वविद्यालय (संशोधन) विधेयक, 2026 का विभिन्न शिक्षक संघों ने पुरजोर विरोध किया है। शिक्षकों का मानना है कि यह कदम उच्च शिक्षा को आम जनता की पहुंच से दूर कर इसे केवल मुनाफे का जरिया बना देगा।

विधेयक में क्या बदलाव किए गए हैं?

इस संशोधन विधेयक का मुख्य उद्देश्य राज्य में निजी विश्वविद्यालयों की स्थापना के लिए नियमों को सरल बनाना है। सबसे महत्वपूर्ण बदलाव भूमि आवश्यकताओं में किया गया है। अब ग्रेटर चेन्नई कॉर्पोरेशन (GCC) क्षेत्र में आवश्यक भूमि को 25 एकड़ से घटाकर 12 एकड़ कर दिया गया है। इसी तरह, अन्य नगर निगमों में इसे 18 एकड़ और शेष क्षेत्रों में 25 एकड़ निर्धारित किया गया है। इसके अलावा, निजी विश्वविद्यालयों के लिए अनिवार्य स्थायी बंदोबस्ती निधि को 50 करोड़ रुपये से घटाकर 25 करोड़ रुपये कर दिया गया है, जिससे नए निजी संस्थानों के लिए प्रवेश की बाधाएं कम हो गई हैं।

Why This Matters

BozokMedia विश्लेषण से पता चलता है कि यह नीतिगत बदलाव राज्य में निजी पूंजी के निवेश को आकर्षित करने की कोशिश है, लेकिन यह एक खतरनाक संतुलन पैदा कर रहा है। जब सरकार निजी क्षेत्र के लिए नियमों को आसान बनाती है, जबकि सरकारी संस्थानों में बुनियादी ढांचे की कमी बनी रहती है, तो शिक्षा का लोकतांत्रिक स्वरूप खतरे में पड़ जाता है। यह प्रवृत्ति राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के साथ तालमेल बिठाने की कोशिश लगती है, जो शिक्षा के निजीकरण को बढ़ावा देती है।

"शिक्षा का व्यवसायीकरण वंचित वर्ग के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा के दरवाजे बंद कर देगा, जिससे सामाजिक असमानता और बढ़ेगी।"

सरकारी शिक्षा प्रणाली की बदहाली

तमिलनाडु सरकारी कॉलेज शिक्षक संघ के महासचिव एस. सुरेश ने गंभीर आरोप लगाए हैं कि पिछले एक दशक से सरकारी विश्वविद्यालयों में स्थायी संकायों की नियुक्ति नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि जहाँ एक ओर केंद्र सरकार 'विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक' के माध्यम से शिक्षा का केंद्रीकरण कर रही है, वहीं राज्य सरकार भी सरकारी शिक्षा प्रणाली के सुधार के प्रति उदासीन रही है।

शिक्षकों ने इस बात पर भी चिंता जताई कि पिछले पांच वर्षों से सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेजों में डॉक्टरेट अनुसंधान कार्यक्रमों (PhD) के लिए प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई है। उनका तर्क है कि 2019 में अधिनियम आने के बाद से स्वीकृत निजी विश्वविद्यालयों की संख्या यह दर्शाती है कि पिछली और वर्तमान दोनों सरकारें उच्च शिक्षा के बाजारीकरण के रास्ते पर अग्रसर हैं।

विवरण पुराना नियम नया संशोधित नियम (2026)
चेन्नई (GCC) भूमि आवश्यकता 25 एकड़ 12 एकड़
बंदोबस्ती निधि (Endowment Fund) ₹50 करोड़ ₹25 करोड़
क्या आप जानते हैं?: 2019 में निजी विश्वविद्यालय अधिनियम लागू होने के बाद से अब तक तमिलनाडु में आठ निजी विश्वविद्यालयों को मंजूरी दी गई है, जिनमें से अधिकांश पिछली सरकार के कार्यकाल में आए थे।

Frequently Asked Questions

प्रश्न 1: शिक्षक इस विधेयक का विरोध क्यों कर रहे हैं?
उत्तर: शिक्षकों का मानना है कि नियमों में ढील देने से शिक्षा का व्यवसायीकरण होगा और गरीब छात्रों के लिए उच्च शिक्षा महंगी और दुर्गम हो जाएगी।

प्रश्न 2: संशोधन विधेयक में भूमि संबंधी क्या बदलाव हैं?
उत्तर: चेन्नई क्षेत्र में भूमि की आवश्यकता 25 एकड़ से घटाकर 12 एकड़ कर दी गई है, ताकि निजी विश्वविद्यालय आसानी से खुल सकें।