कोस्टल कर्नाटक में 29% बारिश की कमी दर्ज की गई है, जिससे नारियल और अंजीर की फसलें गंभीर खतरे में हैं। विशेषज्ञों ने बताया कि कम वर्षा से व्हाइटफ्लाई की संख्या बढ़ेगी और अंजीर में फल गिरने की समस्या बढ़ेगी। यह स्थिति स्थानीय किसान और राज्य की कृषि अर्थव्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती पेश करती है।

कर्नाटक के तटीय क्षेत्र में जलवायु विभाग ने हाल ही में बताया कि इस साल बरसात में 29% की कमी हुई है। यह कमी न केवल धान की बुवाई को प्रभावित कर रही है, बल्कि दो प्रमुख नकदी फसलों—नारियल और अंजीर—के उत्पादन पर भी गहरा असर डालने की संभावना है।

बारिश की कमी और कीट समस्याएँ

केरल के कासरागोड स्थित ICAR‑सीपीसीआरआई के निदेशक K. बालाचंद्र हेब्बर ने बताया कि तटीय कर्नाटक में वर्षा में गिरावट से नारियल के पेड़ पर व्हाइटफ्लाई (सफेद मक्खी) का प्रकोप तेज हो सकता है। गर्मी बढ़ने और नमी घटने पर ये कीट तेजी से प्रजनन करता है, जिससे फसल की गुणवत्ता घटती है और उत्पादन में कमी आती है। इसी तरह, चीकामगलुुरु, हसन, टुमाकुरु, मंड्या, रामनगर और मैसुरु जैसे जिलों में काली-सिर वाले केटरपिलर (ब्लैक‑हेडेड कैटरपिलर) का खतरा भी बढ़ रहा है।

अंजीर (अरेकेनट) पर प्रभाव

अंजीर के बागों में ‘कोले रोग’ (फ्रूट रोट) आम तौर पर निरंतर भारी वर्षा से जुड़ा होता है। कम बारिश से इस रोग की संभावना घटती है, परन्तु हेब्बर ने चेतावनी दी कि वर्षा की कमी के परिणामस्वरूप अंजीर के पेड़ पर फल गिरना (नट शीड़िंग) बढ़ेगा, जिससे कुल उत्पादन पर नकारात्मक असर पड़ेगा। यह संकट पहले से ही पीले पत्ते की बीमारी और पत्ती धब्बे की बीमारी से जूझ रहे किसानों के लिए एक और बड़ी चुनौती है।

कृषि विभाग की तैयारी

सीपीसीआरआई ने कर्नाटक बागवानी विभाग को रोग‑प्रबंधन और कीट नियंत्रण के लिए रोकथामात्मक उपायों की सिफारिश की है। विभाग ने धान की बुवाई के लक्ष्य को भी पुनः समीक्षा किया है; दक्षिण कर्नाटक में 10,000 हेक्टेयर लक्ष्य में से केवल 686 हेक्टेयर ही बुवाई हुई है, जबकि उत्तरा कन्नड़ में 36,860 हेक्टेयर में से 14,378 हेक्टेयर पर काम शुरू हुआ है। यह दर्शाता है कि वर्षा की कमी से कृषि उत्पादन में गिरावट के जोखिम बढ़ रहे हैं।

पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव

पर्यावरण कार्यकर्ता दिनेश होला ने कहा कि कम बारिश से शोल्ला वन जलधाराओं को बरकरार नहीं रख पाएँगे, जिससे नदियों और नालों का जल स्तर घटेगा। इससे वन्यजीव मानवीय बस्तियों की ओर migrate करेंगे, जिससे मानव‑वन्यजीव संघर्ष की संभावना बढ़ेगी। इसके अतिरिक्त, जलविद्युत उत्पादन में भी गिरावट आएगी, जो राज्य की ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित करेगी।

समग्र रूप से, जलवायु परिवर्तन के इस प्रत्यक्ष प्रभाव को देखते हुए, किसानों को नई फसल प्रबंधन तकनीकों, जल संरक्षण उपायों और कीट‑रोग प्रबंधन में सतर्क रहना आवश्यक है। नीति निर्माताओं को भी इस दिशा में त्वरित समर्थन एवं वित्तीय सहायता प्रदान करनी होगी, ताकि कर्नाटक की कृषि अर्थव्यवस्था को स्थिर रखा जा सके।