सैटेलाइट रडार इमेजरी ने मुंबई के बार-बार बाढ़ वाले क्षेत्रों की पहचान की। यूरोपीय स्पेस एजेंसी की सेंटिनेल‑1 छवियों से पता चला कि भू‑आकृति, पुराने जलनिकासी और उच्च ज्वार मिलकर बाढ़ को कायम रखते हैं।
मुंबई में 7‑8 जुलाई 2026 की लगातार बारिश ने भारत की वित्तीय राजधानी को फिर से जाम कर दिया। सड़कों पर पानी का सैलाब, स्थानीय ट्रेनों की धीमी गति, हवाई अड्डे पर देरी और लाखों यात्रियों की फँस जाना यह सब दिखाता है कि शहर को ठीक‑ठाक जल निकासी की कमी है। इस बार भारत टुडे के ओएसआईएनटी (OSINT) टीम ने यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) की सेंटिनेल‑1 रडार सैटेलाइट छवियों का उपयोग करके यह समझा कि क्यों हर मानसून में वही क्षेत्रों में जलभराव होता है।
रडार इमेजरी का विश्लेषण
टीम ने जनवरी 1‑7 की शुष्क‑मौसम की जलस्थिति को 5‑8 जुलाई की भारी बारिश के दौरान प्राप्त सैटेलाइट डेटा से तुलना की। जल‑संकेंद्रण वाले नए क्षेत्रों को संभावित बाढ़‑क्षेत्र के रूप में चिन्हित किया गया। इस प्रक्रिया में विक्रोली, पवई, भंडूप, अंधेरी, चाकाला, जोगेश्वरी, मलाड और अरे‑गोरगांव के कुछ हिस्सों में स्पष्ट जल‑चिह्न देखे गए। इन क्षेत्रों में हर साल भारी वर्षा, ट्रैफ़िक जाम और सार्वजनिक परिवहन में बाधा आती रही है।
भौगोलिक और जल निकासी कारण
मुंबई के भीतर मिती, दहिसर, पोईसर और ओशिवारा नदियों का जल स्तर तेज़ी से बढ़ता है, खासकर जब नालों में कचरा जम गया हो या जल‑मार्ग सिले हो। महानगर क्षेत्र में उल्हास, वैतर्णा और टांसा नदियों के साथ जुड़े नालों की भी स्थिति समान है। जब ये नदियाँ उच्च ज्वार के साथ मिलती हैं, तो निकासी रुक जाती है और पानी शहर के कम ऊँचे हिस्सों में फँस जाता है।
डेटा से पुष्टि और भविष्य की दिशा
सेंटिनेल‑1 रडार का लाभ यह है कि यह बादल‑भरे मौसम में भी दिन‑रात कार्य करता है, जिससे बाढ़‑समय की सतही जल‑स्थिति का सटीक मानचित्रण संभव हुआ। विश्लेषण में स्थायी जल‑स्रोत, दलदल और ज्ञात जल‑स्थलों को हटाकर केवल नई जल‑संकेतों को ही दिखाया गया। इस मानचित्र ने दिखाया कि बाढ़ केवल वर्षा की मात्रा से नहीं, बल्कि शहर की बाउल‑शेप्ड टोपोग्राफी, कंक्रीट‑पैठ, पुराने जल‑निकासी नेटवर्क और प्राकृतिक नालों के अतिक्रमण से जुड़ी है।
नीति‑निर्णय और शहरी योजना पर प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की सैटेलाइट‑आधारित निगरानी को शहर के जल‑प्रबंधन में अनिवार्य बनाना चाहिए। बाढ़‑प्रवण क्षेत्रों में जल‑निकासी को विस्तारित करना, नालों की सफाई और उच्च ज्वार के समय जल‑निकासी को तेज़ करने के लिए पंपिंग स्टेशन स्थापित करना आवश्यक है। साथ ही, भविष्य में नई इमारतों के निर्माण के लिए इन बाढ़‑जोखिम वाले क्षेत्रों को प्रतिबंधित करने की सख्त नीति बनानी चाहिए।