आंध्र प्रदेश का कुप्पम, जो कभी अपने भारी ग्रेनाइट खनन के लिए जाना जाता था, अब मोरों के एक समृद्ध स्वर्ग के रूप में उभर रहा है। स्थानीय किसानों के संरक्षण, धार्मिक आस्था और पारिस्थितिक बदलावों के कारण राष्ट्रीय पक्षी ने इस औद्योगिक क्षेत्र को अपना सुरक्षित ठिकाना बना लिया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- कुप्पम औद्योगिक ग्रेनाइट हब से मोरों के एक प्रमुख संरक्षण केंद्र के रूप में तब्दील हो रहा है।
- स्थानीय किसानों की सुरक्षात्मक प्रकृति और भगवान मुरुगन से जुड़ी धार्मिक आस्था मोरों को अवैध शिकार से बचाती है।
- प्राकृतिक शिकारियों (जैसे बंगाल लोमड़ी) की कमी ने इस क्षेत्र में मोरों की आबादी को तेजी से बढ़ाने में मदद की है।
आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तमिलनाडु की त्रिकोणीय सीमा पर स्थित कुप्पम अपनी भारी मशीनरी, ब्लास्टिंग और ग्रेनाइट खदानों के लिए जाना जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में, यहाँ की सुबह मशीनों के शोर से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय पक्षी मोर की गूंजती आवाजों से होती है। शांतपुरम के ग्रेनाइट पहाड़ों से लेकर गुदुमपल्ले के जंगलों तक, मोरों ने इन पथरीले और खनन प्रभावित इलाकों को अपना आशियाना बना लिया है। यह बदलाव औद्योगिक विकास और प्रकृति के सह-अस्तित्व की एक अनूठी कहानी बयां करता है।
प्रकृति और उद्योग का अनूठा संगम
कुप्पम के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में मोर अब स्थानीय परिदृश्य का एक अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। द्रविड़ियन विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग के प्रोफेसर पी. मुरली कृष्ण रेड्डी बताते हैं कि विश्वविद्यालय परिसर में बड़ी संख्या में मोर मौजूद हैं। मानसून के दौरान पत्थरों और पेड़ों के बीच मोरों का नृत्य देखना छात्रों और शिक्षकों के लिए एक अद्भुत अनुभव होता है। स्थानीय युवाओं का तो यहाँ तक कहना है कि कुप्पम के कुछ गांवों में इंसानों से ज्यादा मोरों की आबादी हो चुकी है।
धार्मिक आस्था और सामुदायिक संरक्षण का सुरक्षा कवच
चित्तूर के जिला वन अधिकारी जी. सुब्बुराज के अनुसार, इस पूरे क्षेत्र में मोरों के शिकार की कोई भी घटना दर्ज नहीं की गई है। इसका सबसे बड़ा कारण स्थानीय लोगों की धार्मिक आस्था है। हिंदू पौराणिक कथाओं में मोर को भगवान मुरुगन (जिन्हें आंध्र प्रदेश में सुब्रमण्यम स्वामी कहा जाता है) का पवित्र वाहन माना जाता है। कुप्पम के पास स्थित प्रसिद्ध गुडीवंका मुरुगन मंदिर और यहाँ की सांस्कृतिक परंपराएं इन पक्षियों के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच का काम करती हैं, जिससे शिकारी इस क्षेत्र से दूर रहते हैं।
पारिस्थितिक संतुलन और शिकारियों की कमी
मोरों की आबादी में इस अप्रत्याशित वृद्धि का एक अन्य महत्वपूर्ण वैज्ञानिक कारण भी है। पड़ोसी राज्य तमिलनाडु के उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में 'बंगाल फॉक्स' (लोमड़ी) का बड़े पैमाने पर शिकार हुआ है। यह लोमड़ी मोरों और उनके अंडों की मुख्य शिकारी हुआ करती थी। शिकारियों की कमी और कुप्पम के किसानों द्वारा खेतों में मिलने वाले सुरक्षित वातावरण के कारण मोरों के प्रजनन की दर में भारी वृद्धि हुई है। गर्मियों के दौरान ये पक्षी नहरों, कृषि तालाबों और जलाशयों के पास भारी संख्या में देखे जाते हैं।