भारत का लगभग आधा हिस्सा इस साल सूखे जैसी स्थिति का सामना कर रहा है, जिससे कृषि और जल सुरक्षा पर संकट मंडरा रहा है। मौसम वैज्ञानिकों ने इस मानसून घाटे के लिए एल नीनो के प्रभाव और मानसून ट्रफ की बदलती स्थिति को जिम्मेदार ठहराया है।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- भारत के लगभग 50% हिस्से में मानसून की भारी कमी दर्ज की गई है, जिससे खरीफ फसलों की बुआई प्रभावित हुई है।
- प्रशांत महासागर में 'एल नीनो' के प्रभाव के कारण मानसूनी हवाओं की गति और नमी का प्रवाह कमजोर हुआ है।
- मानसून ट्रफ के उत्तर की ओर खिसकने से हिमालयी क्षेत्रों में भारी बारिश हुई है, जबकि मैदानी इलाके सूखे रह गए हैं।
भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि की जीवनरेखा कहा जाने वाला दक्षिण-पश्चिम मानसून इस साल बेहद असामान्य व्यवहार कर रहा है। देश का लगभग आधा हिस्सा सूखे और कम बारिश की मार झेल रहा है। जहां एक ओर कुछ पहाड़ी राज्यों में बाढ़ और भूस्खलन से तबाही मची है, वहीं मध्य, दक्षिणी और पश्चिमी भारत के विशाल कृषि क्षेत्र पानी की बूंद-बूंद को तरस रहे हैं। इस मौसम संबंधी असंतुलन ने नीति निर्माताओं, कृषि वैज्ञानिकों और किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं।
एल नीनो का गहराता साया
इस सूखे और अनियमित मानसून के पीछे सबसे बड़ा कारण एल नीनो (El Niño) का प्रभाव माना जा रहा है। एल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय क्षेत्र में समुद्र की सतह के गर्म होने की प्रक्रिया है, जो वैश्विक मौसम चक्र को प्रभावित करती है। ऐतिहासिक रूप से, एल नीनो के वर्षों में भारत में मानसून कमजोर या देरी से आता है। हालांकि मौसम विज्ञानियों का अनुमान था कि यह प्रभाव धीरे-धीरे कमजोर होगा, लेकिन वायुमंडलीय स्तर पर इसके असर ने मानसूनी हवाओं को कमजोर कर दिया है और हिंद महासागर से उठने वाली नमी को भारत के जमीनी हिस्सों तक पहुंचने से रोक दिया है।
मानसून ट्रफ का असामान्य बदलाव
एल नीनो के अलावा, मानसून ट्रफ (कम दबाव की रेखा) का असामान्य रूप से खिसकना भी एक बड़ी वजह है। आमतौर पर यह ट्रफ भारत के मैदानी इलाकों में घूमता रहता है, जिससे देश भर में समान रूप से बारिश होती है। लेकिन इस साल, यह ट्रफ लगातार उत्तर की ओर यानी हिमालय की तलहटी की तरफ स्थानांतरित हो गया है। इसके परिणामस्वरूप, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पूर्वोत्तर में तो अत्यधिक बारिश हो रही है, लेकिन पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे प्रमुख कृषि प्रधान राज्य सूखे रह गए हैं।
कृषि और अर्थव्यवस्था पर गंभीर प्रभाव
बारिश के इस असमान वितरण का सीधा असर भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। धान, दलहन, तिलहन और मोटे अनाजों जैसी मुख्य खरीफ फसलों की बुआई में देरी हो रही है। कई राज्यों के जलाशयों में पानी का स्तर चिंताजनक रूप से नीचे गिर गया है, जिससे आने वाले समय में पीने के पानी और रबी फसलों की सिंचाई के लिए संकट खड़ा हो सकता है। यदि यह स्थिति बनी रही, तो खाद्य मुद्रास्फीति (महंगाई) बढ़ सकती है, जो सीधे तौर पर देश की जीडीपी को प्रभावित करेगी।
जलवायु परिवर्तन और भविष्य की राह
जलवायु परिवर्तन के कारण भारतीय मानसून का पैटर्न तेजी से बदल रहा है, जिसमें 'कम समय में अत्यधिक बारिश' और 'लंबे समय तक सूखा' होना आम होता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है जब भारत को सूखा-प्रतिरोधी फसलों को बढ़ावा देना चाहिए और सूक्ष्म-सिंचाई तकनीकों को अपनाना चाहिए। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) स्थिति पर नजर बनाए हुए है, लेकिन यह संकट हमें याद दिलाता है कि हमारी कृषि व्यवस्था मौसम के मिजाज पर कितनी अधिक निर्भर है और हमें जल्द ही स्थायी समाधान खोजने होंगे।