राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने चालाकुडी में 18 किमी तक फैली अवैध टीक कटाई के मामले में स्वयंसिद्ध कार्यवाही शुरू की। 8.52 लाख रुपये में बेचे गए पेड़ों की मूल्यांकन 41.55 लाख रुपये थी, जिससे पर्यावरणीय नियमों की गंभीर उल्लंघन की ओर इशारा हुआ।

मुख्य बिंदु (Key Takeaways)

  • एनजीटी ने चालाकुडी में अवैध टीक कटाई को लेकर स्वयंसिद्ध कार्यवाही शुरू की।
  • 18 किमी की दूरी पर 200 से अधिक पेड़ फंसाए गए, जिनकी बिक्री मूल्यांकन से 33 लाख रुपये कम थी।
  • केरल वन अधिकारी और केंद्र के पर्यावरण विभाग को मामलों की विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया गया।

राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के प्रधान बेंच, जो न्यायाधीश प्रकाश शृवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद से मिलकर बना है, ने केरल के चालाकुडी में राज्य हिल हाईवे के विस्तार के लिए टेकर वृक्षों की बड़े पैमाने पर कटाई को लेकर स्वयंसिद्ध (सुओ मोतु) कार्यवाही शुरू की। यह कदम दिवस 22 जून 2026 को द हिन्दू में प्रकाशित “ओवर 200 टीक ट्रीज़ इलीगली एक्स्ड इन चालाकुडी” रिपोर्ट के बाद लिया गया।

पृष्ठभूमि और कानूनी ढांचा

भारतीय वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत वन संरक्षण के कड़े नियम हैं, जिनका उल्लंघन गंभीर दंड और कारावास की सम्भावना रखता है। केरल प्रमोशन ऑफ़ ट्री ग्रोथ इन नॉन‑फ़ॉरेस्ट एरिया एक्ट, 2005 केवल वैध रूप से कटे हुए पेड़ों को ही परिवहन पास जारी करने की अनुमति देता है। इस मामले में, फॉरेस्ट रेंज अधिकारी (पारियाराम) ने एक “नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट” जारी किया, जिससे पेड़ निर्यात करने वाली कंपनी ने अवैध रूप से कटे हुए पेड़ों को ले जाया।

घटना का विस्तार

डिवीजनल फॉरेस्ट ऑफिसर (फ्लाइंग स्क्वाड) एर्नाकुलम ने प्रारंभिक जांच में पाया कि वेल्लिकुलंकारा जंक्शन से वैटिला पाला पुल तक 18 किमी की स्ट्रेच में 200 से अधिक टीक पेड़ गिराए गए। इन पेड़ों को केवल ₹8.52 लाख में बेचा गया, जबकि असिस्टेंट कंजरवेटर (सोशल फॉरेस्ट्री), त्रिशूर ने उनका उचित मूल्य ₹41.55 लाख तय किया था। इस मूल्य अंतर से स्पष्ट होता है कि न केवल पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन हुआ, बल्कि आर्थिक भ्रष्टाचार की भी संभावना है।

एनजीटी की कार्यवाही और आगे की राह

एनजीटी ने केरल के हेड ऑफ़ फ़ॉरेस्ट फोर्स, बेंगलुरु स्थित इंटीग्रेटेड रीजनल ऑफिस, तथा केरल पर्यावरण विभाग के सदस्य सचिव को प्रतिवादी के रूप में सम्मिलित किया और उन्हें 31 अगस्त 2026 को दक्षिणी ज़ोनल बेंच, चेन्नई में अपने हलफनामा पेश करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही मामले को दक्षिणी ज़ोनल बेंच, चेन्नई में आगे की जाँच और उपयुक्त आदेशों के लिए स्थानांतरित किया गया।

संभावित प्रभाव

यदि इस मामले में दायित्व सिद्ध हो जाता है, तो यह न केवल स्थानीय वन संरक्षण नीति को सुदृढ़ करेगा, बल्कि अन्य राज्यों में समान अवैध कटाई को रोकने के लिए एक मिसाल स्थापित करेगा। पर्यावरणीय समूहों ने इस कदम की सराहना की है, जबकि स्थानीय उद्योग प्रतिनिधियों ने संभावित आर्थिक नुकसान को लेकर चिंता व्यक्त की है।