असम में मानव-हाथी और बंदरों के बीच बढ़ते संघर्ष ने प्रशासन को नए मानक संचालन प्रोटोकॉल (SOP) बनाने पर मजबूर कर दिया है, जिससे जनहानि को रोका जा सके।
मुख्य बिंदु (Key Takeaways)
- 2025 में मानव-हाथी संघर्ष के कारण 138 लोगों की जान गई, जो अब तक का उच्चतम आंकड़ा है।
- वन्यजीवों की मौत के मुख्य कारणों में करंट लगना और रेल दुर्घटनाएं शामिल हैं।
- सरकार अब हाथी के प्राकृतिक आवासों को बहाल करने की दीर्घकालिक रणनीति पर काम कर रही है।
- बंदरों के बढ़ते आतंक को नियंत्रित करने के लिए नए SOP लागू किए जाएंगे।
असम में वन्यजीवों और मनुष्यों के बीच बढ़ता संघर्ष अब एक गंभीर संकट का रूप ले चुका है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में मानव-हाथी संघर्ष के कारण हुई मौतों की संख्या 138 तक पहुंच गई है, जो पिछले कई वर्षों के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए अब तक का सबसे भयावह आंकड़ा है। यह स्थिति न केवल स्थानीय समुदायों के लिए जीवन का खतरा पैदा कर रही है, बल्कि राज्य की पारिस्थितिकी के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन गई है।
बढ़ता संकट और मृत्यु दर का विश्लेषण
असम के ग्रामीण और वन क्षेत्रों में रहने वाले लोग अब हर दिन असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। हाथियों के झुंड अक्सर खेतों और बस्तियों में घुस आते हैं, जिससे फसलों का भारी नुकसान होता है और जान-माल की हानि होती है। रिपोर्टों से पता चलता है कि हाथियों की मृत्यु के प्रमुख कारणों में विद्युत करंट (electrocution) और रेलवे दुर्घटनाएं शामिल हैं। मानव निर्मित बाधाएं और बिजली के तार वन्यजीवों के लिए मौत का जाल बन गए हैं।
बंदरों का आतंक और प्रशासनिक प्रतिक्रिया
हाथियों के साथ-साथ, असम के कई हिस्सों में बंदरों का बढ़ता आतंक भी एक बड़ी समस्या बनकर उभरा है। बंदरों द्वारा फसलों को नष्ट करने और मानव बस्तियों में घुसपैठ करने की घटनाओं ने कृषि अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। इन दोनों ही संकटों—मानव-हाथी और मानव-बंदर संघर्ष—से निपटने के लिए असम सरकार ने एक सख्त मानक संचालन प्रोटोकॉल (SOP) तैयार करने का निर्णय लिया है।
दीर्घकालिक समाधान: आवास बहाली
प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि केवल तात्कालिक उपाय पर्याप्त नहीं होंगे। सरकार की दीर्घकालिक रणनीति का मुख्य केंद्र हाथियों के प्राकृतिक आवासों (Elephant Habitats) को बहाल करना है। यदि हाथियों को उनके प्राकृतिक जंगलों में पर्याप्त भोजन और सुरक्षित स्थान मिलता है, तो उनके बस्तियों की ओर पलायन में कमी आएगी। इसके साथ ही, रेलवे ट्रैक के पास सुरक्षा घेरा बनाने और बिजली के तारों को सुरक्षित करने पर भी जोर दिया जा रहा है ताकि भविष्य में होने वाली मौतों को न्यूनतम किया जा सके।